एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक सीधा-साधा किसान रहता था। उसके पास खेती के लिए एक छोटा सा खेत था। एक दिन, उस राज्य का नया राजा अपने सैनिकों के साथ वहाँ आया। राजा के हाथ में एक भारी राजदंड (Sceptre) था। राजा ने रामू की ओर इशारा करते हुए कठोर स्वर में कहा, 'अपना आधा अनाज राजकोष में जमा करो, अन्यथा तुम्हें दंड भुगतना होगा।'
रामू डर से कांपने लगा। उसे महसूस हुआ कि राजा उससे कुछ माँग नहीं रहा है, बल्कि उसे डरा रहा है। रामू के मन में एक विचार आया कि एक लुटेरा हाथ में हथियार लेकर खड़ा होकर जैसे कहता है, 'अपना धन मुझे दे दो', ठीक वैसे ही राजा अपने राजदंड के बल पर उससे उसकी संपत्ति मांग रहा है। सत्ता का डर दिखाकर कुछ लेना, माँगने जैसा नहीं बल्कि छीनने जैसा था। राजा का यह व्यवहार एक न्यायप्रिय शासक को शोभा नहीं देता था।