बहुत समय पहले, विक्रम नाम का एक राजा था। वह बहुत शक्तिशाली था, लेकिन उसके मन में दया नहीं थी। वह मानता था कि राजा को प्यार नहीं, बल्कि डर से राज करना चाहिए। एक बार उसके राज्य में भयंकर सूखा पड़ा। लोग दाने-दाने को तरसने लगे।
विक्रम ने मदद करने के बजाय कठोरता से कहा, 'राजकीय भंडार सबके लिए नहीं है! जो कर नहीं देगा, उसे सजा मिलेगी!' उसकी इन कड़वी बातों ने लोगों के दिलों को छलनी कर दिया। एक छोटी बच्ची ने अपने पिता को दुखी देखकर कहा, 'हमारा राजा बहुत निर्दयी है।'
धीरे-धीरे यह बात पूरे राज्य में फैल गई। लोग अब राजा की वीरता के गीत नहीं गाते थे, बल्कि उसे कोसते थे। लोगों के मन में राजा के प्रति सम्मान खत्म हो गया। जब राज्य पर संकट आया, तो किसी ने राजा का साथ नहीं दिया। बिना जन-समर्थन के विक्रम का शासन ढह गया और उसे अपना सिंहासन खोना पड़ा।
विक्रम को बहुत देर से समझ आया कि डर से नहीं, बल्कि प्रेम और करुणा से ही राज्य को संभाला जा सकता है।