बहुत समय पहले, चोलपुरी नामक एक सुंदर राज्य में विक्रम नाम का एक राजा रहता था। विक्रम बहुत दयालु था, लेकिन उसकी एक कमी थी। वह राज्य के महत्वपूर्ण निर्णय खुद जाँचने के बजाय अपने मंत्रियों पर छोड़ देता था। उसे लगता था कि यदि उसने काम सौंप दिया, तो वह पूरी तरह से मंत्री की जिम्मेदारी है।
एक बार, राज्य की एक बड़ी बांध की देखभाल करने की जिम्मेदारी विक्रम ने अपने मुख्य मंत्री सोमसुंदरम को दी। सोमसुंदरम ने इस काम पर ठीक से ध्यान नहीं दिया। जब मानसून की भारी बारिश हुई, तो बांध के दरवाजे ठीक से नहीं खुले और आसपास के खेत पानी में डूब गए।
यह देखकर विक्रम को बहुत गुस्सा आया। वह सभा में गया और सोमसुंदरम पर चिल्लाने लगा, 'तुमने इतनी बड़ी गलती कैसे की? तुम्हारी लापरवाही से मेरा राज्य बर्बाद हो गया!' मंत्री ने अपनी सफाई देने की कोशिश की, लेकिन विक्रम के गुस्से के आगे उसकी एक न चली।
तभी विक्रम के पिता, महाराज धर्म ने हस्तक्षेप किया और कहा, 'पुत्र, एक राजा काम दूसरों को सौंप सकता है, लेकिन उसे उस काम की समझ भी होनी चाहिए। जब कोई गलती हो, तो केवल क्रोध करना समाधान नहीं है। तुम्हें भी यह समझना चाहिए था कि गलती क्यों हुई। तुमने काम को बिना समझे ही मंत्रियों पर छोड़ दिया, इसीलिए यह संकट आया।'
विक्रम को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने मंत्री से माफी मांगी और फिर दोनों ने मिलकर बांध की समस्या का समाधान निकाला। उस दिन के बाद से, विक्रम ने नियम बनाया कि वह कोई भी बड़ा निर्णय लेने से पहले उसकी गहराई से जाँच स्वयं करेगा।