एक शांत गाँव में अशोक नाम का एक युवक रहता था। उसके पिता एक कुशल बुनकर थे। उनके परिवार की प्रतिष्ठा और आजीविका पीढ़ियों से इसी काम से चलती आ रही थी। अशोक के पिता चाहते थे कि वह इस कला को सीखे और परिवार का नाम रोशन करे।
लेकिन अशोक बहुत आलसी था। वह हमेशा कहता, 'कल करूँगा', और काम करने के बजाय समय बर्बाद करता रहता। जहाँ उसके पिता कड़ी मेहनत करते थे, वहीं अशोक बस खाली बैठा रहता या दोस्तों के साथ घूमता रहता।
धीरे-धीरे, अशोक की सुस्ती उसके काम पर भारी पड़ने लगी। उसे काम की बारीकियां याद नहीं रहीं। एक बार जब एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण काम आया, तो वह उसे सही ढंग से पूरा नहीं कर पाया। उसकी इस गलती से परिवार की वर्षों की बनी हुई इज्जत मिट्टी में मिल गई।
अशोक को अहसास हुआ कि उसकी सुस्ती उसके परिवार की प्रतिष्ठा रूपी दीपक को बुझा रही है। उसे अपनी गलती पर बहुत पछतावा हुआ। उसने तय किया कि वह अब सुस्ती छोड़ देगा। उसने सुबह जल्दी उठकर मेहनत करना शुरू किया और अपनी लगन से परिवार का खोया हुआ सम्मान वापस पाया।