बहुत समय पहले, चंद्रपुर नामक एक समृद्ध राज्य में विक्रम नाम का एक राजकुमार रहता था। विक्रम बहुत शक्तिशाली था, लेकिन उसमें एक बहुत बड़ी कमी थी—आलस्य। उसके पिता, राजा आदित्य ने उसे अक्सर चेतावनी दी थी, "पुत्र, एक राजा की शक्ति उसके कर्म में होती है। यदि तुम रुक गए, तो तुम अपना शासन खो दोगे।"
लेकिन विक्रम ने इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। उसने सोचा, "राज्य की रक्षा के लिए सैनिक हैं, मंत्री हैं, मुझे क्या चिंता करनी चाहिए?" वह अपना सारा समय सोने और ऐशो-आराम में बिताने लगा। उसने अपने महत्वपूर्ण कार्यों को कल पर टालना शुरू कर दिया।
विक्रम की इस लापरवाही को देखकर, पड़ोसी राज्य के राजा रुद्र ने अवसर तलाश लिया। उसने देखा कि राजकुमार अब न तो अभ्यास करता है और न ही सीमाओं की जाँच करता है। रुद्र ने अचानक हमला कर दिया। जब तक विक्रम को खतरे का अहसास हुआ और वह अपनी सेना जुटाने की कोशिश करने लगा, तब तक दुश्मन ने महल के दरवाजों तक पहुँचकर खजाना और आधा राज्य पर कब्जा कर लिया था।
विक्रम हार मानकर खड़ा था। उसे समझ आया कि उसके अपने आलस्य ने उसे उसके दुश्मन के सामने लाचार बना दिया है। उसे महसूस हुआ कि आलस्य उसे एक राजा से बदलकर एक गुलाम बनाने की कोशिश कर रहा है। उसने खुद को बदलने का संकल्प लिया। उसने कड़ी मेहनत की, अनुशासन सीखा और अंततः अपनी वीरता से अपना राज्य वापस जीत लिया।