एक समृद्ध राज्य में विक्रम नाम का एक युवा मंत्री रहता था। वह बहुत बुद्धिमान और राजा का विश्वसनीय सलाहकार था। एक दिन, राजा ने एक नया कानून बनाने का निर्णय लिया। विक्रम ने महसूस किया कि यह कानून भले ही अच्छा लग रहा हो, लेकिन इससे गरीब किसानों को बहुत नुकसान होगा।
विक्रम के मित्र रोहन ने उसे फुसफुसाते हुए कहा, "विक्रम, तुम चुप क्यों नहीं रहते? अगर तुम राजा को यह बताओगे, तो वे तुमसे नाराज हो सकते हैं। अगर तुम चुप रहोगे, तो तुम्हारी नौकरी सुरक्षित रहेगी। राजा तुम्हारे बारे में क्या सोचेंगे, इसकी चिंता मत करो!"
विक्रम सोचने लगा। उसे अपने पद को खोने का डर था, लेकिन उसे पता था कि एक सच्चा सलाहकार वह नहीं है जो केवल राजा को खुश करने के लिए 'हाँ में हाँ' मिलाए। उसे लगा कि यदि वह खुद को बचाने के लिए चुप रहा, तो वह अपने कर्तव्य के साथ विश्वासघात करेगा।
अगले दिन दरबार में, विक्रम ने बहुत ही विनम्रता और साहस के साथ राजा के सामने उस कानून की कमियों को रखा। पहले तो राजा को थोड़ा बुरा लगा, लेकिन जब उन्होंने विक्रम की बात को ध्यान से सुना, तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। राजा ने मुस्कुराते हुए कहा, "विक्रम, तुम्हारी सच्चाई के लिए धन्यवाद। जो व्यक्ति राजा के अप्रसन्न होने के डर से सच नहीं बोलता, वह सच्चा मंत्री नहीं हो सकता। तुम्हारी बुद्धिमानी ने हमें बड़ी गलती करने से बचा लिया।"
विक्रम की ईमानदारी ने राजा का भरोसा और भी बढ़ा दिया।