राजा विक्रम एक न्यायप्रिय शासक थे, लेकिन एक भीषण युद्ध के बाद वे बहुत उदास रहने लगे। वे चुपचाप रहने लगे और किसी से बात नहीं करते थे। उनके मंत्रियों को लगा कि राजा उनसे नाराज़ हैं, इसलिए वे डर के मारे गलतियाँ करने लगे।
लेकिन अर्जुन नाम का एक युवा मंत्री बहुत समझदार था। वह राजा के पास लंबी बातें करने नहीं गया। एक शाम, जब राजा उदास होकर बैठे थे, अर्जुन उनके सामने जाकर खड़ा हो गया। उसने राजा से कुछ नहीं कहा, बस उनकी आँखों में देखा और उनके चेहरे के भावों को गौर से पढ़ा।
अर्जुन समझ गया कि राजा क्रोधित नहीं हैं, बल्कि युद्ध में मारे गए सैनिकों के दुख में डूबे हैं। अर्जुन ने बहुत ही कोमलता से कहा, 'महाराज, आपके मन पर आज बहुत बोझ है। युद्ध में खोए हुए वीरों की यादें आपको दुखी कर रही हैं।' राजा हैरान रह गए! उन्होंने तो कुछ कहा भी नहीं था, फिर भी अर्जुन ने उनके हृदय का हाल जान लिया। राजा को लगा जैसे उनके मन का बोझ हल्का हो गया हो। उन्हें समझ आ गया कि उन्हें एक ऐसे साथी की ज़रूरत थी जो बिना बोले सब समझ सके।