विद्यानगर नामक एक राज्य में राजा विक्रम राज करते थे। उनके पास तीन मंत्री थे जो बहुत चतुर होने का दावा करते थे। वे अक्सर कहते थे, 'हमें किसी भी चीज़ को समझने के लिए किसी साधन की ज़रूरत नहीं है।'
एक दिन राजा ने उनकी परीक्षा लेने की सोची। उन्होंने महल के बगीचे में रखे एक बड़े पत्थर की ओर इशारा करते हुए पूछा, 'क्या कोई मुझे इस पत्थर की सटीक लंबाई बता सकता है?'
मंत्री अर्जुन ने आत्मविश्वास से कहा, 'महाराज, मेरी आँखें ही दुनिया का सबसे सटीक पैमाना हैं। मुझे किसी और चीज़ की आवश्यकता नहीं है।'
अर्जुन पत्थर के पास गया, उसे ध्यान से देखा और बोला, 'महाराज, यह पत्थर ठीक पाँच फीट चौड़ा है!'
राजा ने मुस्कुराते हुए एक असली मापने वाली छड़ी निकाली और पत्थर को मापा। पत्थर वास्तव में पाँच फीट आठ इंच का था। अर्जुन ने केवल अपनी आँखों पर भरोसा किया था, जो कि गलत था।
राजा ने समझाया, 'अर्जुन, जो लोग खुद को बहुत बुद्धिमान समझते हैं लेकिन केवल अपनी आँखों को ही पैमाना मानते हैं, वे कभी भी सही तथ्य नहीं जान सकते। सच्ची बुद्धिमानी सही साधनों और प्रमाणों के उपयोग में है।' अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने विनम्रतापूर्वक माफी मांगी।