एक छोटे से गाँव में अर्जुन और उसके पिता माधव रहते थे। माधव एक बहुत ही कुशल कुम्हार थे। वे मिट्टी के ऐसे सुंदर और मजबूत बर्तन बनाते थे कि लोग उन्हें बहुत पसंद करते थे। एक दिन माधव के दोस्त विक्रम ने उन्हें एक लालच दिया। "माधव, क्यों न हम घटिया मिट्टी का इस्तेमाल करें? बर्तन देखने में तो अच्छे लगेंगे, लेकिन जल्दी टूट जाएंगे। इससे हम बहुत सारा पैसा कमा सकते हैं!" विक्रम ने कहा।
अर्जुन ने यह सुना तो उसके मन में भी लालच आया। उसने अपने पिता से पूछा, "पिताजी, क्या विक्रम की बात मानना सही नहीं होगा? इससे हमें जल्दी बहुत सारा धन मिल जाएगा।"
माधव ने प्यार से अर्जुन के सिर पर हाथ रखा और कहा, "बेटा, गलत तरीके से कमाया गया धन कभी सुख नहीं देता। वह केवल परेशानियाँ लाता है। लेकिन अगर हम सही कौशल और ईमानदारी से धन कमाते हैं, तो वह धन हमें सम्मान, पुण्य और सच्ची खुशी देगा।"
अर्जुन ने अपने पिता की बात मान ली। उन्होंने मेहनत जारी रखी और हमेशा अच्छी मिट्टी का ही उपयोग किया। कुछ समय बाद गाँव में एक बड़ा मेला लगा। माधव के बनाए बर्तन अपनी मजबूती के लिए मशहूर थे। लोगों ने खुशी-खुशी बहुत सारे बर्तन खरीदे। माधव के पास बहुत धन आया और गाँव में उनका बहुत सम्मान हुआ। दूसरी ओर, विक्रम के बर्तन जल्दी टूट जाने के कारण लोगों ने उससे सामान खरीदना बंद कर दिया। अर्जुन समझ गया कि ईमानदारी का रास्ता ही सबसे अच्छा है।