एक शांत गाँव में अर्जुन और विक्रम नाम के दो युवक रहते थे। अर्जुन बहुत ही दयालु और शांत स्वभाव का था। वहीं विक्रम को दूसरों की कमियाँ निकालने और उन्हें नीचा दिखाने में मज़ा आता था।
एक बार गाँव के उत्सव के लिए सजावट का काम सौंपा गया। अर्जुन ने बहुत मेहनत और प्यार से काम किया। लेकिन विक्रम ने काम करने के बजाय दूसरों की गलतियाँ निकालना शुरू कर दिया। वह लोगों से कहता, 'तुम्हें तो कुछ आता ही नहीं!' या 'तुम कितना गलत कर रहे हो!' उसकी इन कड़वी बातों से गाँव वालों का उत्साह कम होने लगा और काम में मन नहीं लगा।
गाँव के बुजुर्गों ने देखा कि अर्जुन जहाँ सुंदरता बिखेर रहा है, वहीं विक्रम केवल नफरत फैला रहा है। धीरे-धीरे विक्रम को एहसास हुआ कि दूसरों को दुखी करके उसे कोई सम्मान नहीं मिल रहा, बल्कि वह अकेला होता जा रहा है। उसे समझ आया कि असली खुशी दूसरों को साथ लेकर चलने में है। उसने अर्जुन से माफी माँगी और अपना व्यवहार सुधारा।