एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन बहुत बलवान था, लेकिन उसमें एक कमी थी—वह केवल उन्हीं कामों को करना चाहता था जो बहुत बड़े और प्रभावशाली दिखें। वह छोटी-मोटी ज़िम्मेदारियों को तुच्छ समझकर टाल देता था।
एक दिन उसके पिता, रवि ने उससे कहा, 'अर्जुन, ज़रा बगीचे की टूटी हुई बाड़ ठीक करने में मेरी मदद कर दो।' अर्जुन ने मुँह बनाया और कहा, 'पिताजी, यह तो बहुत छोटा काम है। मैं तो गाँव का रक्षक बनना चाहता हूँ, इन छोटी चीज़ों में क्या रखा है?'
उसी शाम, गाँव के चौक पर एक छोटी सी बहस हुई। एक बच्चे ने गलती से दूसरे का खिलौना तोड़ दिया था। अर्जुन ने देखा, पर सोचा, 'यह तो बहुत मामूली बात है, इसमें कौन उलझे?' और वह चुपचाप चला गया।
कुछ दिनों बाद, गाँव के मुख्य रास्ते पर एक विशाल चट्टान गिर गई, जिससे रास्ता बंद हो गया। अर्जुन ने सोचा कि अब वह अपनी वीरता दिखाएगा। लेकिन गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति, माधव दादा ने उसे रोकते हुए कहा, 'बेटा अर्जुन, जो व्यक्ति छोटी समस्याओं का सामना करने या छोटी गलतियों को सुधारने का साहस नहीं जुटा पाता, वह बड़े संकटों का सामना करने के योग्य कैसे हो सकता है? जो छोटी चीज़ों में अपना मान नहीं बना पाता, वह बड़ी प्रसिद्धि कभी नहीं पा सकता।'
अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने समझ लिया कि महानता की नींव छोटी-छोटी चीज़ों के प्रति ईमानदारी से ही पड़ती है। उसने पहले छोटी समस्याओं को सुलझाना शुरू किया और धीरे-धीरे पूरे गाँव ने उसे एक सच्चा नायक माना।