एक खुशहाल गाँव में रामू नाम का एक किसान रहता था। उसका एक छोटा सा परिवार था—उसकी पत्नी राधा और उनका प्यारा बेटा। वे बहुत सादगी और खुशी से रहते थे। एक दिन, रामू ने अपने दोस्तों के साथ पैसों की एक बाजी (जुआ) लगाई। शुरुआत में वह कुछ पैसे जीत गया, जिससे उसे बहुत खुशी हुई। उसने सोचा, 'अगर मैं थोड़ा और खेलूँ, तो मैं बहुत सारा धन कमा लूँगा।'
लेकिन धीरे-धीरे किस्मत ने साथ छोड़ दिया। रामू ने जो जीता था, वह सब हार गया। हार को जीतने के चक्कर में वह बार-बार खेलने लगा। यह एक ऐसी भूख की तरह बन गया जो कभी शांत नहीं होती थी। राधा ने उसे बहुत समझाया, 'रामू, यह सब छोड़ दो, हम मेहनत की कमाई से ही खुश हैं।' पर रामू पर तो जैसे जुनून सवार था।
कुछ ही समय में, रामू ने अपने खेत, अपना घर और अपनी सारी जमा पूँजी उस जुए में गँवा दी। जिस परिवार के पास सब कुछ था, आज वे दाने-दाने को मोहताज हो गए। रामू को अपनी गलती का एहसास हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसने समझ लिया कि जुआ एक ऐसा दलदल है जो इंसान को पूरी तरह निगल जाता है।