पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का अपने दादाजी के साथ रहता था। हर साल उस गाँव में एक बड़ी चित्रकला प्रतियोगिता होती थी। अर्जुन एक बहुत अच्छा चित्रकार था, और प्रतियोगिता जीतने का मतलब था पूरे गाँव में एक महान कलाकार के रूप में सम्मानित होना।
प्रतियोगिता से कुछ दिन पहले, अर्जुन के दोस्त रोहन ने गलती से अर्जुन की सबसे सुंदर पेंटिंग का एक कोना फाड़ दिया। घबराकर रोहन ने कहा, "अर्जुन, हम इसे ठीक कर सकते हैं। अगर हम इसे चतुराई से छिपा दें, तो किसी को पता नहीं चलेगा और तुम जीत जाओगे!"
अर्जुन ने शांति से जवाब दिया, "रोहन, अगर मैं झूठ बोलकर जीतता हूँ, तो वह जीत मेरी नहीं होगी। वह एक धोखा होगा। मैं अपनी ईमानदारी खोकर मिली जीत से बेहतर हार को स्वीकार करना पसंद करूँगा।"
अर्जुन ने उस साल प्रतियोगिता में भाग न लेने का फैसला किया। उसके लिए उसकी आत्म-प्रतिष्ठा और सच्चाई किसी भी पुरस्कार से बड़ी थी। गाँव वालों और उसके दादाजी ने उसकी इस हिम्मत की बहुत सराहना की। अगले साल, उसकी सच्चाई और कला दोनों के लिए उसे बहुत बड़े सम्मान से नवाज़ा गया।