एक सुंदर से गाँव में विक्रम नाम का एक व्यापारी रहता था। उसके पास बहुत धन था, लेकिन उसका स्वभाव बहुत बुरा था। वह व्यापार में लोगों को धोखा देता था और कभी किसी की मदद नहीं करता था। धीरे-धीरे गाँव के लोग उससे दूर रहने लगे। लोग उससे इसलिए नफरत नहीं करते थे कि वह अमीर था, बल्कि इसलिए करते थे क्योंकि वह दयालु नहीं था।
एक बार गाँव में एक बड़ा उत्सव हुआ। विक्रम ने बहुत सारा सामान बेचा और बहुत मुनाफा कमाया। वह अपने बड़े से घर में बैठा अपने सोने के सिक्कों को गिन रहा था। लेकिन उस बड़े और खाली घर में उसे बहुत अकेलापन महसूस हो रहा था। उसके पास सब कुछ था, फिर भी वह खुश नहीं था।
तभी उसे बाहर बच्चों के खेलने और हंसने की आवाज़ सुनाई दी। अर्जुन नाम का एक छोटा लड़का अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था। अर्जुन के पास पैसे नहीं थे, लेकिन पूरा गाँव उसे प्यार करता था। जब भी अर्जुन को किसी चीज़ की ज़रूरत होती, गाँव के लोग उसकी मदद के लिए दौड़ पड़ते थे।
विक्रम को समझ आया कि उसका सोना उसे वह खुशी नहीं दे सकता जो बाहर के बच्चों के पास है। उसका धन उस ज़हरीले पेड़ की तरह था जो गाँव के बीचों-बीच खड़ा हो। लोग उस पेड़ को देख तो सकते हैं, लेकिन न तो कोई उसका फल खाना चाहेगा और न ही उसकी छाया में बैठना चाहेगा। बिना प्रेम और सम्मान के धन व्यर्थ है।