एक सुंदर से गाँव में कन्नन नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत फुर्तीला था, लेकिन कभी-कभी बिना सोचे-समझे काम कर देता था। एक दिन स्कूल में दौड़ प्रतियोगिता हो रही थी। कन्नन का मन बहुत था कि वह जीत जाए। जैसे ही दौड़ शुरू हुई, उसका दोस्त रवि अचानक लड़खड़ाकर गिर गया। दौड़ की गहमागहमी में किसी ने ध्यान नहीं दिया। कन्नन के मन में एक विचार आया, 'अगर मैं अभी दौड़ता रहूँ, तो मैं आसानी से जीत जाऊँगा और किसी को पता भी नहीं चलेगा।'
लेकिन अगले ही पल उसे बहुत बुरा लगा। उसे लगा कि अगर वह इस तरह जीता, तो यह जीत नहीं, बल्कि धोखा होगा। उसे अपने दादाजी की बात याद आई कि इंसान को अपनी और दूसरों की गलतियों का अहसास होना चाहिए। कन्नन ने दौड़ना बंद कर दिया और रवि के पास गया। उसने रवि का हाथ पकड़कर उसे उठाया और उसके साथ खड़ा हो गया। बाकी बच्चे दौड़कर आगे निकल गए।
शिक्षक ने यह सब देख लिया। कन्नन दौड़ में तो हार गया, लेकिन शिक्षक ने पूरी कक्षा के सामने उसकी ईमानदारी की प्रशंसा की। उन्होंने कहा, 'जीतने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण सही काम करना है।' उस दिन कन्नन ने सीखा कि जीत से बड़ा चरित्र होता है।