हरियाली से भरे एक छोटे से गाँव में कदिर नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत फुर्तीला था, लेकिन उसमें एक कमी थी; उसे इस बात की परवाह नहीं थी कि दूसरे उसके बारे में क्या सोचेंगे।
एक दिन गाँव के मेले के दौरान, कदिर के दोस्त अर्जुन ने पड़ोसी के बागीचे से फल चुराने के लिए दीवार फाँदने की कोशिश की। कदिर जानता था कि यह गलत है, लेकिन उसने सोचा, 'कोई देख नहीं रहा है, तो क्या फर्क पड़ता है?' और वह भी अर्जुन की मदद करने लगा।
गाँव के एक बुजुर्ग, राघव जी ने उन्हें देख लिया। उन्होंने उन्हें डाँटा नहीं, बल्कि प्यार से समझाया, 'बेटा, जो काम दूसरों को शर्मिंदा करे, उसे करने से इंसान की अपनी अच्छाई और संस्कार खत्म हो जाते हैं।'
उस रात कदिर को नींद नहीं आई। उसे महसूस हुआ कि उसने अपनी ईमानदारी खो दी है। उसने समझ लिया कि यदि कोई व्यक्ति उन कार्यों को करने में संकोच नहीं करता जिनसे समाज को शर्म आती है, तो वह धीरे-धीरे अपने चरित्र और गुणों को भी खो देता है। उस दिन के बाद, कदिर ने हमेशा सही रास्ते पर चलने का संकल्प लिया।