एक छोटे से गाँव में कन्नन नाम का एक लड़का रहता था। उसका परिवार बहुत गरीब था। एक दिन उसकी माँ बीमार हो गई और कन्नन को दवा खरीदने के लिए पैसों की ज़रूरत थी। वह गाँव के सबसे अमीर आदमी, माणिक्य के पास मदद माँगने गया।
कन्नन ने विनम्रता से पूछा, "सेठ जी, मेरी माँ बहुत बीमार है, क्या आप थोड़ी मदद कर सकते हैं?" माणिक्य ने अपना मुँह फेर लिया और चिल्लाकर कहा, "मेरे पास भीख माँगने वालों के लिए समय नहीं है, यहाँ से जाओ!"
कन्नन को दुख हुआ, लेकिन उसे गुस्सा नहीं आया। उसने सोचा, "ज़रूरत पड़ने पर मदद माँगना कोई पाप नहीं है। अगर वे मदद नहीं करना चाहते, तो यह उनकी गलती है, मेरी नहीं।"
बाद में गाँव के लोग माणिक्य की अमीरी की तो बात करते थे, लेकिन उनकी इस बेरुखी को भी याद रखते थे। कन्नन ने अपना हक माँगा था, लेकिन माणिक्य ने दया न दिखाकर अपना दोष स्वयं पाया।