एक छोटे से गाँव में आर्यन और मीरा एक साथ रहते थे। उनका जीवन बहुत खुशहाल था। लेकिन उनके बीच कभी-कभी छोटी-मोटी नोक-झोंक होती रहती थी। कभी आर्यन कोई काम भूल जाता, तो कभी मीरा किसी बात पर रूठ जाती। ये छोटी-छोटी नाराजगी उनके जीवन का हिस्सा थीं।
एक दिन, दोनों के बीच एक बड़ी बहस हो गई। मीरा बहुत उदास थी और आर्यन को अपनी गलती का अहसास नहीं हो रहा था। घंटों तक दोनों के बीच चुप्पी रही। उस सन्नाटे में आर्यन को महसूस हुआ कि मीरा के बिना घर कितना सूना है। वह मीरा के पास गया और बड़े प्यार से माफी मांगी। मीरा ने मुस्कुराते हुए उसे माफ कर दिया।
मीरा ने धीरे से कहा, 'आर्यन, अगर हम कभी रूठते ही नहीं, तो हमारे प्यार में वो मिठास कहाँ से आती? ये छोटी-छोटी नाराजगी और फिर एक-दूसरे को मनाना ही हमारे रिश्ते को खास बनाता है।' आर्यन समझ गया कि जैसे एक फल के पूरी तरह पकने पर ही उसका असली स्वाद आता है, वैसे ही उनके प्यार को भी इन उतार-चढ़ावों की ज़रूरत थी।