एक घने जंगल में एक लोमड़ी और एक बिल्ली रहते थे। वे दोनों दोस्त थे, लेकिन अक्सर इस बात पर बहस करते थे कि कौन ज़्यादा चालाक है। लोमड़ी बड़े गर्व से कहती, "मैं इस जंगल की सबसे बड़ी चतुर प्राणी हूँ, मैं किसी को भी अपनी बातों में फंसा सकती हूँ!"
बिल्ली शांति से जवाब देती, "चालाकी अच्छी बात है, लेकिन मुसीबत के समय समझदारी दिखाना ज़्यादा ज़रूरी है।"
एक दिन, यह तय करने के लिए कि असली चतुर कौन है, उन्होंने एक प्रतियोगिता रखी। वे जंगल के उस हिस्से की ओर बढ़े जहाँ शिकारी और उनके कुत्ते अक्सर आते-जाते थे। अचानक, दूर से शिकारी कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनाई दी। कुत्ते बहुत तेज़ी से उनकी ओर आ रहे थे!
बिल्ली ने तुरंत स्थिति को समझा। उसने सोचा, "अभी चालाकी दिखाने का नहीं, बल्कि बचने का समय है।" वह फुर्ती से पास के एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गई और घनी पत्तियों के पीछे छिप गई। वह चुपचाप वहीं बैठी रही जब तक कुत्ते वहाँ से निकल नहीं गए।
लेकिन लोमड़ी अपनी चतुराई दिखाने के चक्कर में पड़ गई। उसने सोचा, "अगर मैं इधर-उधर टेढ़े-मेढ़े रास्ते से दौड़ूँगी, तो कुत्तों को मेरे पैरों के निशान से उलझन हो जाएगी!" लोमड़ी पागलों की तरह इधर-उधर दौड़ने लगी ताकि वह अपने पदचिह्नों को छिपा सके। लेकिन उसकी इस भागदौड़ और शोर ने कुत्तों के लिए उसे ढूँढना और भी आसान बना दिया।
कुत्तों ने लोमड़ी को घेर लिया। लोमड़ी अपनी ही चालाकी में फंस गई थी। वह बड़ी मुश्किल से झाड़ियों के बीच से बचकर भागी।
जब खतरा टल गया, तो बिल्ली पेड़ से नीचे उतरी। लोमड़ी ने शर्मिंदा होकर कहा, "तुम सही कह रही थी, बिल्ली। सिर्फ चालाकी काम नहीं आती, सही समय पर सही फैसला लेना ज़रूरी है।"
उस दिन के बाद लोमड़ी ने घमंड करना छोड़ दिया।
Moral
अहंकारपूर्ण चालाकी से कहीं बेहतर संकट के समय दिखाई गई समझदारी है।