एक बहुत ही सुंदर और घने जंगल में एक शेर रहता था, जो बहुत ही समझदार और न्यायप्रिय राजा था। सभी जानवर उसकी शक्ति से ज्यादा उसके शांत स्वभाव का सम्मान करते थे।
एक दिन जंगल के सभी जानवरों ने मिलकर एक बड़ा उत्सव मनाने का फैसला किया। जंगल के बीचों-बीच एक बड़े मैदान में सभी जानवर इकट्ठा हुए। तभी शेर राजा बड़े ही गर्व और गरिमा के साथ मैदान में आए। शेर को आते देख हिरण, खरगोश और हाथियों जैसे सभी जानवरों ने सम्मान में अपना सिर झुकाया और उन्हें रास्ता दिया।
लेकिन, भीड़ के एक कोने में खड़ा एक गधा यह सब देख रहा था। जैसे ही शेर पास से गुजरा, गधा दूसरे जानवरों से जोर-जोर से फुसफुसाने लगा, "देखो इसे! अब इसमें वो पुरानी ताकत नहीं रही। बूढ़ा होने की वजह से कितना धीरे चल रहा है। क्या यह सच में हमारा राजा बनने लायक है?"
शेर ने गधे की ये अपमानजनक बातें साफ सुन लीं। एक साधारण राजा होता तो शायद गुस्से में दहाड़ता या गधे को सजा देता, लेकिन शेर जानता था कि एक महान नेता को बेकार की बहसों में नहीं पड़ना चाहिए। उसने अपनी गरिमा बनाए रखी।
शेर ने उन बातों पर ध्यान नहीं दिया और मुस्कुराते हुए उत्सव की रस्में पूरी करने लगा। शेर के इस धैर्य को देखकर बाकी जानवर दंग रह गए। गधा जब देख रहा था कि उसकी बातों का राजा पर कोई असर नहीं हुआ, तो वह शर्मिंदा होकर चुप हो गया।
Moral
व्यर्थ की बातों पर ध्यान न देकर अपने कर्तव्य पर अडिग रहना ही महानता है।