एक सुंदर हरे-भरे मैदान में भेड़ों का एक झुंड रहता था। उस झुंड का नेता एक बूढ़ा और बहुत समझदार भेड़ा था। क्योंकि बारिश का मौसम आने वाला था, इसलिए भेड़ों ने अपने लिए पर्याप्त सूखा घास और अनाज इकट्ठा करके सुरक्षित रख लिया था ताकि उन्हें भूखा न रहना पड़े।
एक दिन, एक जंगली बकरी उस मैदान के पास आई। वहाँ अनाज का ढेर देखकर उसने भेड़ों से कहा, 'मैंने देखा कि तुम्हारे पास बहुत सारा अनाज है। मैं भूखी हूँ, क्या तुम मुझे थोड़ा अनाज दे सकते हो?' बुद्धिमान नेता ने विनम्रता से उत्तर दिया, 'क्षमा करें मित्र, लेकिन बारिश का मौसम आने वाला है। हमें यह अनाज अपने छोटे बच्चों के लिए बचाकर रखना होगा।'
जंगली बकरी को यह सुनकर गुस्सा आ गया। उसने उन्हें डराने की कोशिश की और कहा, 'अगर तुमने मुझे अनाज नहीं दिया, तो मैं अपने दोस्त भेड़िए को बुला लूँगी! वह आएगा और तुम्हारे पूरे झुंड का शिकार कर लेगा!'
बुद्धिमान नेता बिल्कुल नहीं डरा। उसने शांति से कहा, 'दोस्त, तुम भेड़िए को बुलाओ या न बुलाओ, एक दिन वह हमें ढूँढते हुए ज़रूर आएगा। लेकिन अगर हम तुम्हारे डर से अनाज दे देंगे, तो हम अपना भोजन भी खो देंगे और मुसीबत में भी पड़ जाएंगे। तुम्हारी धमकी हमें डरा नहीं सकती।'
जब बकरी को समझ आया कि उसकी चालाकी काम नहीं आई, तो वह शर्मिंदा होकर वहाँ से चली गई। नेता की समझदारी ने पूरे झुंड को बचा लिया।
Moral
धमकी से डरने के बजाय समझदारी से काम लेना चाहिए।