एक घने जंगल में एक कछुआ रहता था जो खुद को बहुत बड़ा डॉक्टर बताता था। जंगल के सभी जानवर उसके पास जाते और उसके द्वारा दिए गए पत्तों और जड़ी-बूटियों को दवा समझकर खा लेते थे। वास्तव में, कछुआ केवल उन्हें बेवकूफ बना रहा था और उसके पास कोई असली दवा नहीं थी।
एक दिन एक चतुर खरगोश उस कछुए से मिलने आया। जब खरगोश कछुए के पास बैठा, तो उसने देखा कि कछुए की त्वचा बहुत सूखी और बेजान थी, और उसका शरीर भी बहुत कमजोर और बीमार लग रहा था। जो कछुआ दूसरों का इलाज करने का दावा करता था, वह खुद बहुत बीमार दिख रहा था।
खरगोश ने बड़े सम्मान से पूछा, "डॉक्टर साहब, मुझे एक अजीब बीमारी हो गई है। मेरी त्वचा काली और रूखी हो गई है, और मेरा शरीर भी टेढ़ा-मेढ़ा महसूस होता है। क्या आपके पास इसका कोई जादुई इलाज है?"
कछुआ गर्व से बोला, "हाँ, बिल्कुल है! यह पत्ता खाओगे तो त्वचा चमक उठेगी, और यह जड़ खाओगे तो शरीर एकदम सीधा हो जाएगा!"
खरगोश मुस्कुराया और बोला, "तो फिर, उन दोनों दवाइयों को पहले आप खुद खाकर देख लीजिए। अगर आप ठीक हो गए, तो मैं भी उन्हें खा लूँगा!"
कछुआ सन्न रह गया। उसे पता था कि उसके पास कोई दवा नहीं है। पास ही खड़े अन्य जानवरों ने भी यह बात सुन ली। उन्हें समझ आ गया कि कछुआ उन्हें धोखा दे रहा है। सबने कहा, "हम कितने मूर्ख थे जो ऐसे व्यक्ति से इलाज माँग रहे थे जो खुद ही बीमार है!" सभी जानवर वहाँ से चले गए और कछुआ शर्मिंदा होकर अकेला रह गया।
Moral
दूसरों की कमियाँ निकालने से पहले, हमें खुद को सुधारना चाहिए।