एक ऊंचे पहाड़ की चोटी पर अक्विला नाम का एक शक्तिशाली बाज रहता था। अक्विला के पास बहुत बड़े और मज़बूत पंख थे, जो तेज़ हवाओं में भी उसे आसानी से उड़ाते थे। एक दिन, जब अक्विला एक पेड़ की टहनी पर आराम कर रहा था, उसकी नज़र एक अजीब चीज़ पर पड़ी।
पास ही के एक पेड़ में एक रंग-बिरंगी पतंग फंसी हुई थी, जो हवा में लहरा रही थी। अक्विला उसके पास उड़कर गया और पूछा, "अजीब यात्री, तुम्हारे पास तो पंख भी नहीं हैं, फिर भी तुम इतनी ऊँचाई पर कैसे लहरा रहे हो?"
पतंग ने गर्व से उत्तर दिया, "मैं एक पतंग हूँ! मुझे तुम्हारी तरह पंखों की ज़रूरत नहीं है। देखो, मैं तुमसे भी कहीं ज़्यादा ऊँचा उड़ सकती हूँ। मैं बादलों के बीच नाचती हूँ!"
अक्विला धीरे से मुस्कुराया और बोला, "यह सच है कि तुम बहुत ऊँचाई पर हो। लेकिन मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारे पीछे एक लंबा धागा है। वह धागा ज़मीन पर किसी इंसान के हाथ में है। हवा तुम्हें नहीं उड़ा रही, बल्कि वह धागा तुम्हें खींच रहा है। तुम ऊँचाई पर तो हो, लेकिन तुम बँधे हुए हो।"
अक्विला ने अपने पंख फैलाए और कहा, "लेकिन मैं? मैं अपनी मर्ज़ी से उड़ता हूँ। मैं जब चाहूँ आसमान की ऊँचाइयों को छू सकता हूँ और जब चाहूँ ज़मीन पर आ सकता हूँ। मेरे पंख मेरे नियंत्रण में हैं और मेरी आज़ादी मेरे पास है।" पतंग चुप हो गई। उसे समझ आ गया कि ऊँचाई पाने के चक्कर में उसने अपनी आज़ादी खो दी है।
Moral
सच्ची महानता आज़ादी में है, ऊँचाई में नहीं।