एक समय की बात है, विक्रमादित्य नाम का एक प्रतापी राजा था। उसके दरबार में कई सलाहकार थे। वे सभी राजा के सामने बहुत ही विनम्र और आज्ञाकारी बने रहते थे। लेकिन एक दिन राजा के मन में एक शंका पैदा हुई। उन्होंने सोचा, 'क्या ये सलाहकार वास्तव में मेरे प्रति वफादार हैं, या वे केवल मेरे वैभव और शक्ति से प्रेम करते हैं?'
इस सच्चाई को जानने के लिए राजा ने एक योजना बनाई। एक दिन राजा अपने सभी सलाहकारों को लेकर एक घने और डरावने जंगल की यात्रा पर निकले। जंगल बहुत ही गहरा और खतरनाक था। राजा ने चेतावनी दी, "सावधान रहें! यह जंगल बहुत घना है और यहाँ जंगली जानवर घूमते रहते हैं।"
यात्रा के दौरान, जब वे एक पथरीली जगह पर रुके, तो राजा ने जानबूझकर अपने सोने के सिक्कों से भरी एक थैली जमीन पर गिरा दी। थैली फट गई और सोने के सिक्के चारों ओर बिखर गए। राजा ने दुखी होने का नाटक करते हुए कहा, "ओह! मेरा खजाना बिखर गया! जो भी चाहो, तुम सिक्के उठा सकते हो, ये तुम्हारे हैं!"
यह सुनते ही, सभी सलाहकार सोने के लालच में पड़ गए। वे राजा की चिंता भूलकर सिक्के बटोरने में लग गए। लेकिन सोमन नाम का एक सलाहकार राजा के पास ही खड़ा रहा। उसने एक भी सिक्का नहीं उठाया।
राजा ने पूछा, "सोमन, तुमने सोना क्यों नहीं लिया?"
सोमन ने विनम्रता से उत्तर दिया, "महाराज, इस जंगल में खतरा कभी भी आ सकता है। आपकी सुरक्षा मेरे लिए इन सिक्कों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। मैं आपके साथ खड़ा रहकर आपकी रक्षा करना चाहता हूँ।"
राजा सोमन की निस्वार्थ सेवा और वफादारी देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सोमन को अपना मुख्य सलाहकार नियुक्त किया और उस पर अटूट विश्वास जताया।
Moral
सच्ची वफादारी लालच में नहीं, बल्कि कर्तव्य में होती है।