एक छोटे से गाँव में सोमू नाम का एक व्यापारी रहता था। उसके पास एक तेज़ दौड़ने वाला घोड़ा और एक मेहनती गधा था। घोड़े को बहुत घमंड था और वह खुद को गधे से बहुत श्रेष्ठ समझता था। वह अक्सर सोमू के पास जाकर गधे की बुराई करता रहता था।
"मालिक, देखिए! यह गधा कितना सुस्त है। यह धीरे चलता है, इसलिए हम कभी समय पर बाज़ार नहीं पहुँच पाएंगे," घोड़ा अक्सर कहता था। सोमू उसकी बातों में आकर गधे को डाँट देता था, जिसे सुनकर घोड़ा मन ही मन बहुत खुश होता था।
एक दिन सोमू को एक बड़ी नदी पार करनी थी। उसके पास कीमती रेशम और अनाज के बोरे थे। गधे पर बहुत सारा सामान लदा हुआ था।
नदी के किनारे पहुँचते ही, भारी बोझ के कारण गधा थककर बैठ गया। घोड़ा तुरंत सोमू से बोला, "देखा मालिक! मैंने कहा था न कि यह गधा आलसी है। अब हम नदी के किनारे ही फँस कर रह जाएंगे!"
तभी गधे ने बड़ी समझदारी से कहा, "मालिक, आज नदी में पानी का बहाव बहुत तेज़ है। अगर ये बोरे पानी में भीग गए, तो आपका बहुत नुकसान हो जाएगा। घोड़ा लंबा है, इसलिए कृपया इन कीमती रेशमी कपड़ों के बोरे घोड़े की पीठ पर रख दें। इससे वे पानी से सुरक्षित रहेंगे।"
सोमू को गधे की बात सही लगी। उसने कीमती बोरे गधे से उतारकर घोड़े पर रख दिए। अचानक भारी वजन महसूस होने से घोड़ा डर गया और कांपने लगा। घोड़े को बहुत सावधानी से नदी पार करनी पड़ी ताकि रेशम सुरक्षित रहे।
नदी पार करने के बाद सोमू ने घोड़े की प्रशंसा की, लेकिन घोड़ा बहुत दुखी था। उसे एहसास हुआ कि दूसरों की बुराई करने के चक्कर में, उसे खुद ही दोगुना बोझ उठाना पड़ा।
Moral
दूसरों की पीठ पीछे बुराई करना अंततः खुद के लिए ही मुसीबत बन जाता है।