एक घने जंगल में काया नाम की एक गाय और सिगई नाम की एक ऊँची जिराफ़ बहुत अच्छी सहेलियाँ थीं। सिगई को पेड़ों की ऊँची टहनियों से कोमल पत्तियाँ खाना बहुत पसंद था।
एक दिन, जब सिगई खाने की तलाश में घूम रही थी, उसका पैर अचानक एक छिपे हुए गड्ढे में फिसल गया। वह गड्ढा घास से ढका हुआ था, इसलिए दिखाई नहीं दे रहा था। सिगई गड्ढे में गिर गई और घबरा गई। 'ओह नहीं! मैं यहाँ फंस गई हूँ! क्या मेरी सहेली काया मुझे ढूँढ पाएगी?' सिगई डर के मारे रोने लगी।
जैसे-जैसे अंधेरा बढ़ने लगा, काया ने सिगई की आवाज़ सुनी और दौड़कर वहाँ पहुँची। सिगई को देखकर वह चिल्लाई, 'काया! मुझे बचाओ! मैं बहुत डर गई हूँ और यहाँ से निकल नहीं पा रही हूँ!'
काया ने मुस्कुराते हुए कहा, 'दोस्त, डरो मत! क्या तुम भूल गई कि तुम कितनी ऊँची हो? तुम इस जंगल में एक मीनार की तरह हो। यह छोटा सा गड्ढा तुम्हारे लिए कोई बड़ी बात नहीं है। बस अपने लंबे पैरों का इस्तेमाल करो और सीधे खड़े हो जाओ।'
सिगई को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने अपना डर भगाया और शांति से अपने लंबे पैरों को गड्ढे की दीवारों पर टिकाया। जैसे ही उसने ऊपर की ओर देखा, उसे समझ आया कि उसका कद इस गड्ढे से बहुत बड़ा है। उसने एक ज़ोरदार प्रयास किया और आसानी से गड्ढे से बाहर निकल आई।
सिगई ने राहत की साँस ली और काया को गले लगा लिया। 'शुक्रिया काया! मैं डर के मारे अपनी ताकत भूल गई थी।' काया ने कहा, 'जब हम अपनी खूबियों को भूल जाते हैं, तभी डर हमें परेशान करता है।'
Moral
अपनी ताकत को पहचानना ही हर मुश्किल का हल है।