बहुत समय पहले की बात है, एक शक्तिशाली राजा अपने भव्य महल की बालकनी से नीचे देख रहा था। उसने देखा कि महल के मुख्य द्वार की छाया में कुछ थके हुए यात्री आराम कर रहे हैं। यह देखकर राजा को बहुत गुस्सा आया। उसने सोचा, "ये लोग मेरे महल के द्वार पर क्यों बैठे रहते हैं? ये मेरी शांति भंग करते हैं। इन्हें कहीं और जाकर बैठना चाहिए।"
अगले ही दिन, राजा ने आदेश दिया कि महल की दीवारों या दरवाजों के पास कोई भी नहीं बैठ सकता। यात्री परेशान हो गए क्योंकि उनके पास बैठने के लिए कोई और जगह नहीं थी। वे राजा के बुद्धिमान सलाहकार, विक्रम के पास मदद के लिए पहुँचे।
विक्रम ने राजा को सबक सिखाने की एक योजना बनाई। अगले दिन, वह फटे-पुराने कपड़े पहनकर महल के द्वार पर जाकर बैठ गया। जब राजा ने उसे देखा, तो वह आगबबूला हो गया। "मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने की हिम्मत कैसे हुई? सैनिकों, इसे तुरंत यहाँ से हटाओ!"
विक्रम ने शांति से कहा, "मैं तभी जाऊँगा जब इस जगह का असली मालिक आकर मुझे जाने के लिए कहेगा।"
राजा क्रोध में भरकर नीचे आया और बोला, "यह मेरा महल है! मैं इसका मालिक हूँ!"
विक्रम ने मुस्कुराते हुए पूछा, "महाराज, यह आपका महल है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन आपसे पहले यह किसका महल था?"
राजा ने कहा, "यह मेरे पिता का महल था।"
विक्रम ने फिर पूछा, "और आपके पिता से पहले?"
"वह मेरे दादाजी का महल था," राजा ने उत्तर दिया।
विक्रम ने खड़े होकर कहा, "महाराज, आपके दादाजी से पहले भी कई राजा इस महल में रहे हैं। वे सब अब इस दुनिया में नहीं हैं। इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, यहाँ तक कि यह विशाल महल भी नहीं। यदि आप दूसरों को थोड़ी सी छाया भी नहीं दे सकते, तो याद रखिए कि समय इस महल को भी आपसे छीन लेगा।"
राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे दुख हुआ कि उसने अपने अहंकार में दूसरों की छोटी सी ज़रूरत को भी ठुकरा दिया। उसने यात्रियों से माफी मांगी और विक्रम को धन्यवाद दिया।
कहानी की सीख
Moral
संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है; इसलिए अपने अधिकार का उपयोग दयालुता के साथ करें।