एक सुंदर गाँव में सोमू और मीरा रहते थे। वे दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे और पूरे गाँव में उनकी जोड़ी मिसाल मानी जाती थी।
लेकिन समय बदला और मीरा को एक त्वचा रोग हो गया, जिससे उसका रूप बदलने लगा। उसे डर था कि कहीं सोमू उसे उसकी सुंदरता के बिना नफरत न करने लगे। सोमू ने उसे बहुत समझाया, पर मीरा का डर कम नहीं हुआ।
तभी एक दुर्घटना में सोमू की आँखों की रोशनी चली गई। अब मीरा की भूमिका बदल गई। उसने अपनी सुंदरता की चिंता छोड़ दी और सोमू की आँखों की तरह बन गई। वह सोमू का हर काम करती और उसका सहारा बनी। सोमू की अंधेरी दुनिया में मीरा का प्यार ही एकमात्र उजाला था।
सालों बाद, मीरा के निधन के बाद, सोमू बहुत दुखी होकर घर छोड़ने लगा। उसके एक पड़ोसी ने पूछा, 'सोमू, बिना मीरा के और बिना आँखों के तुम अकेले कैसे रहोगे?'
सोमू ने मुस्कुराते हुए कहा, 'मित्र, मुझे सब दिखाई देता था। मैंने अंधे होने का नाटक सिर्फ इसलिए किया ताकि मीरा को यह न लगे कि मैं उसे देख रहा हूँ। वह अपनी बदली हुई सूरत से शर्मिंदा थी, और मैं नहीं चाहता था कि उसकी वजह से हमारे रिश्ते में कोई कमी आए। मैंने उसकी आँखों की रोशनी नहीं, बल्कि उसके दिल का साथ दिया।'
सोमू के इस निस्वार्थ प्रेम को सुनकर पड़ोसी दंग रह गया।
Moral
सच्चा प्रेम रूप नहीं, मन देखता है।