पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में आदित्य अपनी बेटी नीला के साथ रहता था। आदित्य के पास एक बहुत ही खास चीज़ थी—उसकी दादी द्वारा दिया गया एक सुनहरा रेशमी कपड़ा। आदित्य जब भी किसी को उपहार देता, तो उसे इसी सुनहरे कपड़े में लपेटता था। उसके लिए वह कपड़ा केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि उसकी दादी की याद और प्यार का प्रतीक था।
एक क्रिसमस के मौसम में, जब आदित्य अपने उपहार तैयार कर रहा था, उसने देखा कि वह सुनहरा कपड़ा गायब है। उसने घबराकर नीला से पूछा। नीला ने धीरे से कहा, "पापा, मैंने किसी को उपहार देने के लिए उस कपड़े का उपयोग किया है।"
आदित्य को बहुत गुस्सा आया। "नीला, क्या तुम्हें पता है वह कपड़ा मेरे लिए कितना कीमती है?" उसने चिल्लाकर कहा। नीला उदास होकर अपने कमरे में चली गई। गुस्से में आदित्य ने क्रिसमस ट्री के नीचे एक छोटा सा डिब्बा देखा, लेकिन उसने उस पर ध्यान नहीं दिया और उसे एक तरफ रख दिया।
क्रिसमस की सुबह, नीला आदित्य के पास आई और मुस्कुराते हुए एक छोटा सा डिब्बा उसे दिया। उस पर लिखा था, "प्यारे पापा के लिए।"
आदित्य ने उत्साह से डिब्बा खोला, लेकिन उसके अंदर कुछ भी नहीं था! डिब्बा बिल्कुल खाली था। "नीला!" आदित्य फिर से चिल्लाया, "क्या तुमने मेरे कीमती कपड़े का इस्तेमाल सिर्फ एक खाली डिब्बे को लपेटने के लिए किया?"
नीला ने मासूमियत से कहा, "पापा, यह खाली नहीं है। मैंने इसमें ढेर सारे चुंबन (kisses) भरे हैं। जब भी मैं डिब्बे के अंदर चुंबन लेती थी, मैं अपना प्यार उसमें भरकर डिब्बा बंद कर देती थी। यही मेरा उपहार है।"
ya आदित्य का दिल भर आया। उसे समझ आया कि सोने के कपड़े से कहीं ज्यादा कीमती उसकी बेटी का निस्वार्थ प्यार है। उसने नीला को गले लगाया और अपनी गलती के लिए माफी मांगी। उस साल उनका क्रिसमस सबसे यादगार बन गया।
Moral
भौतिक वस्तुओं से कहीं बढ़कर प्रेम और भावनाएं अनमोल हैं।