वह एक सुहावनी शाम थी। अर्जुन और उसकी माँ बाज़ार में कुछ सामान खरीदने गए थे। वहाँ उन्होंने सड़क के किनारे एक छोटे लड़के, रवि को देखा, जो पुराने किताबें बेचकर अपने परिवार के लिए कुछ पैसे जुटाने की कोशिश कर रहा था। रवि की मेहनत देखकर अर्जुन को बहुत अच्छा लगा।
अर्जुन उसके पास गया और बोला, "रवि, तुम यहाँ अकेले क्यों बैठे हो? हमारे घर चलो, हम बातें करेंगे।" रवि हिचकिचाते हुए उनके साथ घर चला गया। जब अर्जुन की माँ ने उसे खाना खिलाना चाहा, तो रवि ने विनम्रता से कहा, "बहुत धन्यवाद आंटी, लेकिन मैं अकेले नहीं खा सकता। मेरी छोटी बहन और भाई घर पर भूखे होंगे। उन्हें साथ लाए बिना मैं खाना नहीं खाऊँगा।"
रवि के अपने भाई-बहनों के प्रति इस प्रेम को देखकर अर्जुन की माँ का दिल भर आया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "तो फिर उन्हें भी साथ ले आओ! आज हमारे घर एक छोटा सा उत्सव है, और हम चाहते हो कि तुम सब हमारे खास मेहमान बनो।"
रवि दौड़कर गया और अपने भाई-बहनों को लेकर वापस आया। जब वे तीनों घर के अंदर आए, तो अर्जुन और उसकी माँ दंग रह गए। अर्जुन की माँ ने उन्हें प्यार से भोजन परोसते हुए कहा, "आज हम यह भोज उन लोगों के सम्मान में दे रहे हैं जो कड़ी मेहनत करते हैं और हार नहीं मानते। तुम्हारी मेहनत हमें प्रेरित करती है।"
बच्चों ने बड़े चाव से खाना खाया। उस दिन से अर्जुन और रवि पक्के दोस्त बन गए। अर्जुन ने सीखा कि दूसरों की मदद करने का मतलब केवल उन पर दया करना नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान और मेहनत का आदर करना भी है।
Moral
दूसरों के परिश्रम का सम्मान करना ही सच्ची मानवता है।