बहुत समय पहले की बात है, एक घने जंगल में सभी जानवर मिल-जुलकर रहते थे। उस समय कछुओं के पास अपनी सुरक्षा के लिए कोई सख्त कवच नहीं होता था। वे बहुत फुर्तीले और कोमल होते थे।
एक दिन, दो ज्ञानी ऋषि उस जंगल में आए। उनका स्वागत करने के लिए सभी जानवरों ने एक उत्सव मनाने का निर्णय लिया। खरगोश ने एक दौड़ प्रतियोगिता की घोषणा की: "हर जानवर को एक भारी नारियल लेकर जंगल के दूसरे छोर पर स्थित बड़े पेड़ तक दौड़ना होगा। जो सबसे पहले पहुँचेगा, वही विजेता होगा!"
एक कछुआ बहुत चालाक था और वह बिना मेहनत किए जीतना चाहता था। उसने सोचा, "अगर मैं नारियल को हल्का कर लूँ, तो मैं आसानी से जीत जाऊँगा।" उसने एक नारियल लिया और उसके अंदर का सारा पानी निकाल दिया। अब वह नारियल बहुत हल्का हो गया था। उसने उस हल्के नारियल को अपनी पीठ पर रख लिया और मुस्कुराने लगा।
ऋषियों ने कछुए की यह चालाकी देख ली। उन्होंने उसे सबक सिखाने का सोचा। एक ऋषि ने भालू से कहा, "जाओ और कछुए से कहो कि दौड़ के नियम बदल गए हैं। अब जो सबसे अंत में पहुँचेगा, वही विजेता कहलाएगा!"
यह सुनकर कछुआ बहुत खुश हुआ। बाकी जानवर भारी नारियल लेकर तेज़ी से दौड़ने की कोशिश में थक गए, लेकिन कछुआ बहुत ही धीरे-धीरे चलने लगा। वह सोच रहा था कि वह बहुत आराम से जीत जाएगा।
कई दिन बीत गए। कछुआ बहुत धीरे चल रहा था। धीरे-धीरे, उसकी पीठ पर रखा वह नारियल का खोल उसकी खाल के साथ जुड़ने लगा। वह उसके शरीर का हिस्सा बन गया। अंत में, वह हल्का नारियल एक कठोर और मजबूत कवच में बदल गया। कछुए को समझ आया कि उसकी चालाकी ने उसे एक स्थायी जिम्मेदारी दे दी है। उसने सीखा कि ईमानदारी ही सबसे अच्छा रास्ता है।
Moral
चालाकी से मिली जीत अस्थायी होती है, ईमानदारी ही स्थायी है।