एक सुंदर झील के किनारे कवि नाम का एक मछुआरा रहता था। कवि बहुत ही सीधा और संतोषी इंसान था। लेकिन उसकी पत्नी माया बहुत लालची थी। कवि चाहे कितनी भी चीज़ें घर ले आए, माया को हमेशा और ज़्यादा चाहिए होता था।
एक सुबह जब कवि जाल डाल रहा था, तो उसके जाल में एक चमकती हुई सुनहरी मछली फंसी। कवि हैरान रह गया जब मछली बोलने लगी! 'कृपया मुझे छोड़ दो कवि, मैं तुम्हारी एक अच्छी दोस्त बनूँगी,' मछली ने विनती की। कवि को उस पर दया आ गई और उसने उसे वापस पानी में छोड़ दिया।
जब कवि ने यह बात माया को बताई, तो वह बहुत गुस्सा हुई। 'तुम कितने मूर्ख हो! तुम उस जादुई मछली से एक बड़ा महल माँग सकते थे!' उसने चिल्लाकर कहा। कवि भारी मन से झील पर गया और मछली से एक सुंदर घर माँगा। मछली ने उनकी इच्छा पूरी कर दी।
पर माया का लालच कम नहीं हुआ। 'मुझे एक बड़ा महल चाहिए!' उसने आदेश दिया। कवि फिर गया और मछली ने उन्हें एक भव्य महल दे दिया। लेकिन माया की ज़िद बढ़ती गई। 'मुझे बादलों के ऊपर तैरता हुआ महल चाहिए!' उसने कहा।
कवि ने झिझकते हुए मछली से यह बात कही। मछली ने इच्छा तो पूरी कर दी, लेकिन जब कवि घर लौटा, तो वहाँ कुछ नहीं था! माया के लालच के कारण वह महल बादलों में कहीं खो गया था। माया बहुत डर गई और रोने लगी।
कवि फिर से झील पर गया और बोला, 'मुझे महल नहीं चाहिए, बस मेरी पत्नी खुश और संतुष्ट रहे।' मछली मुस्कुराई और बोली, 'अब तुमने सही चीज़ माँगी है।' जादू से उनका पुराना छोटा घर वापस आ गया। माया अब बदल चुकी थी और वह खुशी-खुशी रहने लगी।
Moral
लालच का फल बुरा होता है; संतोष ही सबसे बड़ा धन है।