एक बहुत ही सुंदर और हरे-भरे जंगल में बहुत सारे जानवर मिल-जुलकर रहते थे। जंगल के सभी जानवर बहुत मेहनती थे। वे अपनी बुद्धिमानी से आने वाले समय के लिए भोजन इकट्ठा करके सुरक्षित जगहों पर छिपाकर रखते थे ताकि उन्हें कभी भूखा न रहना पड़े।
लेकिन उसी जंगल में कालू नाम का एक कौआ रहता था, जो बहुत ही आलसी था। उसे खुद मेहनत करके खाना ढूँढना बिल्कुल पसंद नहीं था। वह हमेशा दूसरे जानवरों द्वारा जमा किए गए भोजन को चुराने की कोशिश करता रहता था। जब जानवरों को पता चला कि कोई उनका खाना चुरा रहा है, तो उन्होंने अपना भोजन और भी गुप्त स्थानों पर छिपाना शुरू कर दिया। इससे कालू के लिए खाना मिलना मुश्किल हो गया।
कालू ने सोचा कि मेहनत करने के बजाय क्यों न किसी को बेवकूफ बनाया जाए। वह खरगोशों के पास गया और बोला, "प्यारे खरगोशों! क्या आपको पता है? मैंने सुना है कि गिलहरियों ने जो खाना जमा किया है, वह खराब हो गया है और उसमें ज़हर है! अगर आप उसे खाएंगे तो बीमार पड़ जाएंगे। आप अपना सारा खाना मुझे दे दीजिए, मैं उसे चखकर आपको बता दूँगा कि कौन सा खाना सुरक्षित है और कौन सा नहीं।"
खरगोशों का मुखिया बहुत बुद्धिमान था। उसने कालू की चाल को तुरंत पहचान लिया। उसने सोचा कि कालू को एक सबक सिखाना बहुत ज़रूरी है। खरगोश के मुखिया ने एक मूंगफली ली, उसके अंदर बहुत सारा चिपचिपा शहद और गोंद भर दिया और फिर उसे मजबूती से बंद कर दिया। वह कालू के पास गया और बोला, "कालू भाई, कृपया इस मूंगफली को चखकर बताइए कि यह खाने लायक है या नहीं?"
भूख के मारे पागल कालू ने बिना सोचे-समझे उस मूंगफली पर ज़ोर से चोंच मारी। जैसे ही उसने चोंच मारी, उसके अंदर का चिपचिपा शहद और गोंद उसकी चोंच और मुँह को आपस में चिपका कर बंद कर दिया! कालू ने बहुत कोशिश की, लेकिन उसका मुँह नहीं खुला। वह घबराकर इधर-उधर फड़फड़ाने लगा। तब खरगोश के मुखिया ने कहा, "कालू, क्या तुम्हें लगा कि हम मूर्ख हैं? तुम बिना मेहनत किए दूसरों को धोखा देकर खाना चाहते थे। तुम्हारी इस आलस और चोरी की आदत के लिए यही सही सजा है!"
कालू को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह बहुत शर्मिंदा होकर वहाँ से उड़ गया। उस दिन के बाद से उसने चोरी करना छोड़ दिया और खुद मेहनत करके भोजन ढूँढने लगा।
Moral
आलस और बेईमानी हमेशा मुसीबत और शर्मिंदगी ही लाते हैं।