एक विशाल साम्राज्य में विक्रम नाम का एक युवा राजा राज करता था। अपने पिता के निधन के बाद, बहुत कम उम्र में ही उसे सिंहासन संभालना पड़ा। उसके पास उत्साह तो बहुत था, लेकिन अनुभव की कमी थी।
एक दिन, विक्रम अपने सैनिकों के साथ शिकार करने जंगल में गया। शिकार के रोमांच में वह अपने सैनिकों से बहुत दूर निकल गया और रास्ता भटक गया। जब सूरज ढलने लगा, तो उसे अहसास हुआ कि वह अकेला और रास्ताहीन है। भूख और डर से व्याकुल होकर वह एक विशाल पेड़ के नीचे बैठ गया।
तभी वहाँ से एक वृद्ध व्यक्ति गुजरे। राजा के कीमती कपड़ों को देखकर वे समझ गए कि यह कोई साधारण यात्री नहीं है। विक्रम ने हिचकिचाते हुए कहा, "मैं इस देश का राजा हूँ। शिकार करते समय मैं रास्ता भटक गया हूँ और मुझे अपने महल का मार्ग नहीं पता।"
वृद्ध व्यक्ति मुस्कुराए और बोले, "महाराज, जो पूरे देश पर शासन करता है, वह एक जंगल में रास्ता कैसे खो सकता है?"
विक्रम ने सिर झुकाकर कहा, "मुझे यह पद विरासत में मिला है, लेकिन जीवन जीने का अनुभव और समझ अभी मुझमें नहीं है।"
भूख से बेहाल राजा को उस वृद्ध ने जमीन से खोदकर निकाली हुई कुछ जड़ें खाने को दीं। उन्हें खाते ही विक्रम को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने सोचा, "मैं केवल पेड़ों पर लगे फलों को खोज रहा था, जबकि भोजन तो जमीन के नीचे छिपा था!"
वृद्ध ने राजा को रास्ता दिखाने का फैसला किया। कृतज्ञ होकर विक्रम ने उन्हें अपना राजकीय अंगूठी देने की कोशिश की, लेकिन वृद्ध ने उसे अस्वीकार कर दिया और कहा, "मुझे धन नहीं, बस आपको एक महान राजा बनते देखना है।"
रास्ते में वृद्ध ने विक्रम को प्रकृति के गुर सिखाए। उन्होंने कहा, "सूरज की दिशा से समय और रास्ता पहचानना सीखो। जानवरों के पदचिह्नों और उनके संकेतों से पानी का स्रोत खोजना सीखो। एक राजा को अपने आसपास की छोटी से छोटी चीज़ पर ध्यान देना चाहिए।"
कुछ ही देर में राजा की सेना उन्हें ढूँढते हुए वहाँ पहुँच गई। सैनिकों को उस वृद्ध को सम्मान देते देख विक्रम दंग रह गया। उसे पता चला कि वह वृद्ध कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि एक महान ज्ञानी थे।
विक्रम ने उनके चरणों में झुककर आशीर्वाद लिया। उस दिन के बाद, विक्रम ने निरंतर सीखना जारी रखा और एक महान और बुद्धिमान सम्राट बना।
Moral
शक्ति मिलना सौभाग्य हो सकता है, लेकिन एक महान नेता बनने के लिए निरंतर सीखना और अनुभव आवश्यक है।