बहुत समय पहले, एक सुंदर जंगल में सभी जानवर मिल-जुलकर रहते थे। ईश्वर ने हर जानवर के लिए अलग भोजन तय किया था। बंदरों के लिए पेड़ों के मीठे फल थे और जिराफ़ के लिए ऊंचे पेड़ों की पत्तियां थीं।
लेकिन एक जिराफ़ के मन में बहुत लालच आ गया। उसने सोचा, 'ये पत्तियां खाना तो बहुत उबाऊ है, क्यों न बंदरों के मीठे फल खाए जाएं!' वह चुपके से बंदरों के फल चुराने लगी। बंदर बहुत दुखी हुए और उन्होंने ईश्वर से मदद मांगी। ईश्वर की आवाज़ आई, 'मैं खुद नहीं आऊंगा, लेकिन न्याय तुम्हारे साथियों के माध्यम से होगा।'
एक दिन, एक बड़े हाथी ने बंदरों के फल की ओर देखा। जिराफ़ ने हाथी को रोकने के बजाय, उसका मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया। उसने हाथी को 'चोर' और 'बड़ा बेवकूफ' कहकर अपमानित किया। हाथी को बहुत गुस्सा आया। उसने अपनी सूंड से जिराफ़ की गर्दन को धीरे से लेकिन मजबूती से लपेटा। उस खिंचाव के कारण जिराफ़ की गर्दन लंबी होती गई।
अब जिराफ़ की गर्दन इतनी लंबी हो गई थी कि वह नीचे झुककर फल नहीं खा सकती थी। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने बंदरों से माफ़ी मांगी और तब से वह केवल ऊंचे पेड़ों की पत्तियां ही खाने लगी।