एक बहुत बड़े शहर में विक्रम नाम का एक धनी व्यापारी रहता था। उसके पास अपार संपत्ति और एक भव्य महल था। लेकिन विक्रम में एक बुराई थी; उसे अपनी दौलत का बहुत घमंड था और वह हमेशा दुनिया को अपनी अमीरी दिखाना चाहता था।
उसका बेटा आर्यन बहुत ही शांत और समझदार लड़का था। एक दिन, विक्रम ने आर्यन को अपना वैभव दिखाने का फैसला किया। उसने आर्यन को अपने सोने के गहने, रेशमी वस्त्र और सुंदर बगीचे दिखाए। घूमते हुए विक्रम ने गर्व से कहा, "देखा आर्यन? इस पूरे राज्य में हमारे जैसा अमीर कोई नहीं है। हमारे पास जो कुछ भी है, वह अतुलनीय है।"
जब वे वापस अपने महल पहुँचे, तो विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा, "अब तो तुम्हें समझ आ गया होगा कि हम कितने भाग्यशाली हैं।"
आर्यन ने बहुत ही विनम्रता से कहा, "पिताजी, जो आपने दिखाया वह बहुत सुंदर है, लेकिन वह सब सीमित है। हमारे पास एक छोटा सा बगीचा है, लेकिन जंगल के पेड़ आसमान को छूते हैं। हमारे पास रोशनी के लिए दीये हैं, लेकिन सूरज और चाँद पूरी दुनिया को रोशन करते हैं। हमारे पास एक छोटा सा फव्वारा है, लेकिन पहाड़ों से निकलने वाली नदियाँ कभी नहीं रुकतीं। प्रकृति की इस असीमित उदारता के सामने हम कितने छोटे हैं, यह आज मुझे समझ आया।"
आर्यन की बात सुनकर विक्रम निशब्द रह गया। उसे अहसास हुआ कि असली धन केवल तिजोरी में बंद सोने में नहीं, बल्कि प्रकृति के इन अनमोल उपहारों में है।
Moral
प्रकृति के अनमोल उपहारों के सामने मनुष्य की संपत्ति बहुत छोटी है।