बहुत समय पहले, विक्रम नाम का एक न्यायप्रिय राजा था। एक दिन, राजा के मन में चमकते हुए कीमती रत्नों को इकट्ठा करने की तीव्र इच्छा जागी। राजा को खुश करने के लिए उसके मंत्रियों ने रत्नों की खोज शुरू कर दी।
एक लालची मंत्री ने एक जौहरी को धोखा दिया और एक बहुत बड़े हीरे को बहुत ही कम कीमत पर खरीद लिया। इससे जौहरी को भारी नुकसान हुआ। जौहरी न्याय की गुहार लेकर दरबार में आया। बुद्धिमान मंत्री धर्म ने जौहरी की परेशानी देखी और उसकी मदद करने का निर्णय लिया।
"घबराओ मत, जौहरी भाई," धर्म ने कहा। "मेरे पास एक उपाय है।" धर्म ने चीनी की एक बड़ी डली ली और उसे बड़ी कुशलता से तराश कर एक हीरे जैसा आकार दे दिया। उसने उसे इतना चमकाया कि वह असली हीरे जैसा दिखने लगा।
अगले दिन सुबह, जब राजा विक्रम अपने बगीचे में टहल रहे थे, धर्म वह चमकदार चीनी का हीरा लेकर आया। "महाराज! देखिए यह अद्भुत रत्न! यह आपके वस्त्रों पर बहुत सुंदर लगेगा," धर्म ने कहा। राजा ने खुशी-खुशी उसे स्वीकार कर लिया और पहन लिया।
लेकिन कुछ ही देर बाद, सूरज की गर्मी से वह चीनी का हीरा पिघलकर गायब हो गया! "मेरा हीरा कहाँ गया?" राजा घबराकर चिल्लाए।
धर्म शांति से राजा के पास आया और बोला, "महाराज, वह हीरा केवल एक भ्रम था। लेकिन उस जौहरी को उसका सही मेहनताना मिलना चाहिए। हमें उसकी भरपाई करनी चाहिए।" राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने तुरंत जौहरी को हीरे की पूरी और सही कीमत चुका दी। जौहरी खुशी-खुशी घर चला गया और राजा ने सीखा कि लालच से केवल भ्रम पैदा होता है, जबकि ईमानदारी ही असली धन है।
Moral
लालच केवल भ्रम पैदा करता है, जबकि ईमानदारी सुख देती है।