एक घने जंगल के पास कालू नाम का एक कौआ रहता था। एक तपती गर्मी की दोपहर में, सूरज की तेज़ धूप के कारण कालू को बहुत ज़ोर की प्यास लगी। वह पानी की तलाश में इधर-उधर उड़ता रहा, लेकिन गर्मी की वजह से सारे तालाब और नदियाँ सूख चुकी थीं।
थकान और प्यास से कालू की हालत खराब हो गई थी। उसे लगा कि अब वह और नहीं उड़ पाएगा। तभी उसे दूर एक पुराना बगीचा दिखाई दिया। उस बगीचे में उसे एक छोटा सा मिट्टी का घड़ा दिखाई दिया। कालू ने सोचा, 'शायद इस घड़े में पानी मिल जाए!' वह उम्मीद के साथ घड़े के पास पहुँचा।
जब उसने घड़े के अंदर झाँका, तो देखा कि तल में थोड़ा सा पानी था। वह बहुत खुश हुआ और तुरंत पानी पीने के लिए अपनी चोंच अंदर डाली। लेकिन घड़े का मुँह बहुत छोटा था और पानी बहुत नीचे था, इसलिए उसकी चोंच पानी तक नहीं पहुँच सकी। कालू बहुत उदास हो गया। उसने सोचा, 'इतनी दूर भटकने के बाद भी पानी इतना पास है और मैं इसे पी नहीं सकता!'
कालू ने हार नहीं मानी। उसने शांत होकर सोचने का फैसला किया। तभी उसकी नज़र पास में पड़े कुछ छोटे कंकड़ों पर पड़ी। उसके दिमाग में एक उपाय आया। उसने एक कंकड़ अपनी चोंच में उठाया और घड़े में डाल दिया। टप! उसने एक और कंकड़ डाला, और फिर एक और।
जैसे-जैसे कंकड़ घड़े की तली में जमा होते गए, पानी का स्तर धीरे-धीरे ऊपर आने लगा। कालू बिना रुके कंकड़ डालता रहा। अंत में, पानी घड़े के बिल्कुल ऊपर तक आ गया। कालू ने भरपेट पानी पिया और अपनी प्यास बुझाई। अपनी बुद्धिमानी से उसने अपनी मुश्किल हल कर ली थी और वह बहुत खुश हुआ।
Moral
जहाँ चाह, वहाँ राह; बुद्धि से हर समस्या का समाधान संभव है।