बहुत समय पहले की बात है, सोमू नाम का एक विद्वान घने जंगल से गुजर रहा था। चलते-चलते उसने गलती से एक चीज़ पर पैर रख दिया। उसे लगा कि वह सूखी टहनी है, लेकिन वह एक सोता हुआ वन-देवता था! देवता अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने कहा, "तुम्हारी लापरवाही के कारण अब तुम एक बंदर बन जाओगे!" सोमू तुरंत एक बंदर में बदल गया। अपनी गलती पर पछताते हुए वह जंगल में रहने लगा।
एक दिन, उसने यात्रियों को सुना कि पास के महापुरी राज्य में एक बड़ी प्रतियोगिता होने वाली है। जो व्यक्ति कठिन सवालों के सही जवाब देगा, उसे प्रधानमंत्री बनाया जाएगा। सोमू ने सोचा कि यह अपनी बुद्धि दिखाने का मौका है। वह बंदर के रूप में महल पहुँचा। पहरेदारों ने उसे रोका, लेकिन जब बंदर ने एक पत्ते पर अपना नाम लिखा, तो राजा ने उसे प्रतियोगिता में शामिल होने की अनुमति दे दी।
पहला प्रश्न था: "कौन अधिक भारी है? एक विशाल पत्थर या अपराधबोध से भरा मन?" विद्वानों ने पत्थर के बारे में लिखा, लेकिन बंदर ने लिखा, "अपराधबोध से भरा मन दुनिया में सबसे भारी होता है।" राजा बहुत प्रभावित हुए।
दूसरा प्रश्न: राजा ने एक भूखे वृद्ध के सामने सोने का सिक्का रखा और पूछा, "यह किसे मिलना चाहिए?" विद्वानों ने कहा कि वृद्ध को देना चाहिए। लेकिन बंदर ने लिखा, "एक सिक्के से भूख नहीं मिटती। राजा को कर (tax) कम करना चाहिए और ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि राज्य में कोई भी भूखा न रहे। यह सिक्का उस व्यवस्था का हिस्सा होना चाहिए।"
तीसरा प्रश्न: महल के बगीचे में एक मुरझाया हुआ आम का पेड़ था। राजा ने पूछा, "इसे कैसे ठीक करें?" विद्वानों ने खाद डालने की सलाह दी। लेकिन बंदर ने मिट्टी की जांच की और लिखा, "मिट्टी अच्छी है, लेकिन बड़े पेड़ों की छाया के कारण इसे पर्याप्त धूप नहीं मिल रही है। इसे धूप वाली जगह पर लगा देने से यह फिर से हरा-भरा हो जाएगा।"
बंदर की बुद्धिमत्ता देखकर राजा ने उसे अपना प्रधानमंत्री घोषित कर दिया। जैसे ही प्रजा ने खुशी मनाई, बंदर के ऊपर से श्राप हट गया और वह फिर से विद्वान सोमू बन गया! सोमू ने समझ लिया कि सावधानी और दूसरों के प्रति सहानुभूति ही सच्ची बुद्धिमत्ता है।
Moral
सच्ची बुद्धि केवल ज्ञान में नहीं, बल्कि दूसरों की जरूरतों को समझने में भी है।