एक सुंदर शहर में रवि नाम का एक कुशल कारीगर रहता था। वह लकड़ी पर नक्काशी करके सुंदर सजावटी सामान और औज़ार बनाने में माहिर था। रवि के तीन बेटे थे, जो अपने पिता से ही यह कला सीख रहे थे।
समय बीता और रवि बूढ़ा हो गया। उसने सोचा कि अपने व्यवसाय को किसे सौंपना चाहिए। वह चाहता था कि उसका उत्तराधिकारी न केवल कुशल हो, बल्कि बुद्धिमान भी हो। उसने अपने तीनों बेटों को बुलाया और एक चुनौती दी। "पास की घाटी में एक बड़ा उत्सव होने वाला है। वहाँ जाओ और अपने बनाए सामान बेचकर आओ। जो सबसे अधिक मुनाफा कमाकर लाएगा, वही इस व्यवसाय का मालिक बनेगा।"
सबसे बड़े बेटे ने सबसे पहले यात्रा शुरू की। उसने एक छोटे बाज़ार में अपने औज़ार बेचने की कोशिश की, लेकिन वहाँ के लोगों के पास पहले से ही ज़रूरत का सारा सामान था। वह दुखी होकर लौटा और बोला, "पिताजी, मैं बहुत कम सामान बेच पाया क्योंकि लोगों के पास पहले से ही सब कुछ था।"
दूसरे बेटे ने यात्रा की। उत्सव की भीड़ को देखकर उसने प्रवेश द्वार पर एक छोटी सी दुकान लगाई और यात्रियों को छोटे खिलौने बेचे। वह कुछ मुनाफा लेकर लौटा और खुद पर गर्व महसूस करने लगा।
अंत में, सबसे छोटे बेटे कविन की बारी थी। कविन ने केवल सामान बेचने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसने लोगों की जरूरतों को समझा। उसने देखा कि उत्सव में आने वाले लोग इस पल को यादगार बनाना चाहते हैं। वह उत्सव के आयोजकों के पास गया और बोला, "हजारों लोग यहाँ आ रहे हैं। यदि आप उन्हें उत्सव की याद में लकड़ी के सुंदर नक्काशीदार स्मृति चिह्न (souvenirs) देंगे, तो वे इसे हमेशा संभाल कर रखेंगे।"
आयोजकों को कविन का विचार बहुत पसंद आया। उन्होंने कविन को विशेष स्मृति चिह्न बनाने का काम सौंपा। कविन ने बहुत मेहनत से सुंदर और अनोखी वस्तुएं बनाईं। जब वह लौटा, तो उसके पास अपने भाइयों से कहीं ज्यादा मुनाफा था।
रवि बहुत खुश हुआ। उसने देखा कि कविन ने केवल सामान नहीं बेचा, बल्कि उसने लोगों की भावनाओं और अवसर की ज़रूरत को समझा था। रवि ने खुशी-खुशी अपना पूरा व्यवसाय कविन को सौंप दिया।
Moral
दूसरों की जरूरतों को समझकर किया गया काम ही असली सफलता दिलाता है।