एक शांत गाँव में सोमू नाम का एक किसान अपनी गायों के साथ रहता था। हर सुबह, सोमू अपनी गायों से ताज़ा मक्खन इकट्ठा करता और उसे पास के एक बड़े किराने के स्टोर में बेचने ले जाता था। दुकानदार, रघु, उस मक्खन को खरीदता था ताकि वह उसे गाँव वालों को बेच सके।
कुछ दिनों के बाद, रघु को संदेह होने लगा। उसने सोचा, 'सोमू रोज़ एक किलो मक्खन लाता है, लेकिन जब मैं इसे तौलता हूँ, तो कुछ गड़बड़ लगती है।' एक दिन जब सोमू मक्खन लेकर आया, तो रघु ने उसे तराजू पर रखा। मक्खन एक किलो से थोड़ा कम था। रघु को बहुत गुस्सा आया। उसने सोमू पर चोरी का आरोप लगाया और गाँव के मुखिया के पास शिकायत करने चला गया।
मुखिया ने सोमू को बुलाया और पूछा, 'रघु कह रहा है कि तुम कम मक्खन देकर उसे धोखा दे रहे हो।' सोमू ने बहुत शांति से उत्तर दिया, 'मुखिया जी, मैं पूरी तरह ईमानदार हूँ। सच तो यह है कि मैं अपने घर का सारा सामान रघु की दुकान से ही खरीदता हूँ। कल मैं मक्खन लाऊँगा और हम सबके सामने इसे तौलेंगे।'
अगली सुबह, सोमू ताज़ा मक्खन लेकर आया। मुखिया और गाँव वालों की मौजूदगी में, सोमू ने मक्खन को तराजू पर रखा। वह ठीक एक किलो था। रघु हैरान रह गया। तब मुखिया ने जाँच करने का फैसला किया। उन्होंने सोमू से रघु की दुकान से खरीदे गए कुछ अन्य सामानों को तौलने के लिए कहा।
तभी एक बड़ी सच्चाई सामने आई। रघु अपनी दुकान में अन्य सामान भी कम तौलकर बेच रहा था। उसने अपनी गलती छिपाने के लिए सोमू पर झूठा आरोप लगाया था। मुखिया ने रघु पर भारी जुर्माना लगाया और उसे अपनी गलती सुधारने को कहा। सोमू की ईमानदारी की जीत हुई।
Moral
दूसरों के साथ किया गया छल अंततः आपके पास ही वापस आता है।