एक सुनहरी सुबह थी। अर्जुन नाम का एक लड़का पास के शहर में लगने वाले एक बड़े मेले में जाने की तैयारी कर रहा था। उसकी यात्रा लंबी थी, इसलिए उसकी माँ ने उसके लिए स्वादिष्ट नाश्ता बनाया।
नाश्ता करते समय, अर्जुन ने एक सेब काटने के लिए एक छोटा चाकू निकाला। तभी उसकी माँ ने प्यार से कहा, "अर्जुन, क्या तुम यह चाकू मुझे दे सकते हो?"
अर्जुन ने चाकू उठाया। उसने चाकू को बहुत सावधानी से पकड़ा और उसे अपनी माँ की ओर इस तरह घुमाया कि चाकू का तेज़ धार वाला हिस्सा उसकी अपनी तरफ रहे और सुरक्षित हत्था (handle) उसकी माँ की तरफ रहे। उसने बहुत ही सलीके से चाकू माँ को थमाया।
उसकी माँ मुस्कुराई और बोली, "अर्जुन, आज तुमने बिना जाने ही एक बहुत बड़ा सबक सीख लिया है। जिस तरह से तुमने यह चाकू मुझे दिया, वह मुझे बहुत पसंद आया।"
अर्जुन ने हैरानी से पूछा, "पर माँ, इसमें क्या खास है?"
माँ ने समझाया, "बेटा, जीवन में भी लोग अक्सर ऐसी बातें कहेंगे जो चाकू की धार की तरह तेज़ और चुभने वाली होंगी। जब कोई तुमसे गुस्से में या कड़वा बोले, तो तुम्हें उस चाकू के हत्थे की तरह बनना चाहिए। यानी, कड़वाहट को धैर्य से स्वीकार करना और दूसरों को हमेशा प्यार और शांति देना। शब्दों का इस्तेमाल चोट पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि जोड़ने के लिए करना चाहिए।"
अर्जुन को अपनी छोटी सी क्रिया का बड़ा महत्व समझ आ गया। वह समझ गया कि समझदारी और विनम्रता से किसी भी स्थिति को संभाला जा सकता है। वह खुशी-खुशी अपनी यात्रा पर निकल पड़ा।
Moral
कठोर शब्दों का सामना हमेशा विनम्रता और धैर्य से करना चाहिए।