एक समय की बात है, विक्रम नाम का एक बहुत अमीर व्यापारी था। उसके पास विशाल महल, ज़मीन और सोने के सिक्कों से भरे संदूक थे। विक्रम का पूरा जीवन बस और अधिक धन कमाने के पीछे भागते हुए बीत रहा था। उसे लगता था कि पैसा ही दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है।
एक सुबह जब उसकी आँख खुली, तो उसने अपने कमरे में एक रहस्यमयी आकृति देखी। वह समय का रक्षक था। रक्षक ने गंभीर स्वर में कहा, 'विक्रम, तुम्हारा समय समाप्त हो गया है। अब तुम्हें मेरे साथ चलना होगा।'
विक्रम बुरी तरह डर गया। उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा, 'कृपया मुझे थोड़ा समय दें! मुझे अपनी संपत्ति का हिसाब करने और अपने परिवार की देखभाल करने के लिए एक महीना चाहिए।'
रक्षक ने कहा, 'समय किसी के लिए नहीं रुकता।'
विक्रम ने फिर कोशिश की, 'ठीक है, मुझे एक हफ्ता दे दीजिए!' पर रक्षक नहीं माना। 'बस एक दिन दे दीजिए!' विक्रम रोने लगा, लेकिन रक्षक ने एक दिन के लिए भी मना कर दिया।
अंत में, विक्रम ने अपनी आख़िरी विनती की, 'मुझे बस एक मिनट दे दीजिए। सिर्फ एक मिनट, मुझे एक संदेश लिखना है!' उसकी बेबसी देखकर रक्षक ने उसे एक मिनट का समय दे दिया।
विक्रम ने कांपते हाथों से एक कागज़ पर लिखा: 'मैंने अपना पूरा जीवन धन बटोरने में लगा दिया, लेकिन यह धन मुझे एक अतिरिक्त मिनट भी नहीं दे सका। धन के पीछे मत भागो, बल्कि जीवन के हर पल को जीओ।'
जैसे ही उसने लिखना समाप्त किया, रक्षक उसे अपने साथ ले गया। विक्रम ने पीछे बहुत धन छोड़ा था, लेकिन उसका लिखा हुआ वह संदेश उसके परिवार के लिए सबसे बड़ी सीख बन गया।
Moral
धन से समय नहीं खरीदा जा सकता; जीवन के हर पल का आनंद लेना ही असली अमीरी है।