एक सुनहरी दोपहर में, बुद्धिमान मंत्री विक्रम अपनी छोटी बेटी माया को राजदरबार में लेकर आए। राजा ने माया को देखा और बहुत प्यार से उसे अपने पास ही बैठने के लिए कहा।
कुछ समय बीतने के बाद, राजा ने देखा कि माया बहुत शांत बैठी है। उसने न तो कोई खेल खेला और न ही इधर-उधर देखा। राजा ने उत्सुकता से पूछा, "नन्हीं परी, तुम इतनी चुप क्यों हो? क्या तुम डरी हुई हो या तुम्हें बोरियत हो रही है?"
माया ने राजा की ओर देखा और बहुत ही विनम्रता से कहा, "नहीं महाराज, मैं डरी हुई नहीं हूँ। मैं बस एक विशेष नियम का पालन कर रही हूँ। जब मैं बड़ों के साथ होती हूँ, तो मैं बहुत कम बोलती हूँ, लेकिन जब मैं अपने हमउम्र बच्चों के साथ होती हूँ, तो मैं बहुत बातें करती हूँ।"
राजा हैरान रह गए। उन्होंने पूछा, "यह कैसी अजीब आदत है? लोग तो कहते हैं कि हमें कम और सटीक बोलना चाहिए। तुम बड़ों के सामने इतनी चुप क्यों रहती हो?"
माया ने बहुत ही समझदारी से उत्तर दिया, "महाराज, जब बड़े बात करते हैं, तो वे हमें जीवन के अनमोल सबक सिखाते हैं। यदि मैं बोलने में व्यस्त रहूँगी, तो मैं उनकी बातों के गहरे अर्थ को नहीं समझ पाऊँगी। चुप रहकर सुनने से ही हम ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन जब मैं छोटे बच्चों से बात करती हूँ, तो उन्हें चीजें समझाने के लिए मुझे विस्तार से बोलना पड़ता है, ताकि वे भी सीख सकें।"
माया की इस परिपक्व सोच को सुनकर राजा अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्हें लगा कि इतनी छोटी सी बच्ची के पास कितना गहरा ज्ञान है। राजा ने विक्रम के पालन-पोषण की प्रशंसा की और माया को सुंदर उपहार और आभूषण भेंट किए।
Moral
ज्ञान प्राप्त करने के लिए बड़ों को ध्यान से सुनें, और ज्ञान बाँटने के लिए बच्चों से विस्तार से बात करें।