एक घने जंगल के किनारे एक अजीब सा बाघ रहता था। अन्य बाघों के विपरीत, उसके शरीर पर कोई काली धारियां नहीं थीं। वह बहुत शक्तिशाली था, लेकिन स्वभाव से बहुत डरपोक था। वह किसी भी आवाज़ से डरकर छिप जाता था।
एक दिन, बाघ ने जंगल के पास एक खेत में एक किसान को देखा। एक बड़ा सा बैल किसान के इशारों पर खेत जोत रहा था। बाघ यह देखकर हैरान रह गया। उसने सोचा, 'यह बैल इतना ताकतवर है, फिर भी यह एक साधारण इंसान की सेवा क्यों कर रहा है?'
जब किसान आराम कर रहा था, बाघ उसके पास गया और पूछा, 'महाराज, यह बैल इतना बलवान होने के बाद भी आपकी सेवा क्यों करता है?'
पास खड़े बैल ने जवाब दिया, 'बाघ भाई, हर जीव का अपना स्वभाव होता है। यह इंसान मुझे भोजन और आश्रय देता है, इसलिए मैं इसके काम आता हूँ।'
बाघ को समझ नहीं आया। बैल ने आगे कहा, 'तुम्हारे पास शक्ति तो है, लेकिन तुम डरपोक हो। अगर तुम अपनी असली प्रकृति को पहचान लो, तो तुम भी जंगल के राजा की तरह सम्मान पा सकते हो।'
बाघ उलझन में था। उसने किसान से पूछा, 'क्या आप मुझे मेरी असली प्रकृति पहचानने में मदद कर सकते हैं?'
किसान समझदार था। उसे लगा कि अगर बाघ को अपनी शक्ति का पता चल गया, तो वह खतरनाक हो सकता है। उसने एक तरकीब सोची। 'अगर तुम अनुशासन सीखना चाहते हो, तो तुम्हें एक पेड़ से बंधना होगा, जैसे बैल बंधा रहता है,' किसान ने कहा।
बाघ ने उसकी बात मान ली। किसान ने उसे एक मोटे रस्से से पेड़ से बाँध दिया। थोड़ी देर बाद, किसान ने बाघ के पास सूखी लकड़ियाँ जला दीं। आग की गर्मी और धुएँ से बाघ घबरा गया। उसे लगा, 'क्या इंसान मुझे धोखा दे रहा है?' तभी उसे बैल की बात याद आई कि इंसान चतुर होते हैं।
बाघ ने अपनी पूरी ताकत जुटाई और एक ज़ोरदार दहाड़ के साथ पेड़ को हिला दिया। रस्सी टूट गई! जलती हुई रस्सी से बचने के लिए बाघ भागकर पास के तालाब में कूद गया।
जब बाघ के शरीर के घाव ठीक हुए, तो एक चमत्कार हुआ। उसके शरीर पर सुंदर काली धारियां उभर आईं। वे धारियां उसकी बहादुरी का प्रतीक थीं। अब वह डरपोक नहीं रहा, बल्कि जंगल का असली राजा बन गया।
Moral
जब आप अपने डर का सामना करते हैं, तभी आप अपनी असली शक्ति और पहचान पाते हैं।