एक घने जंगल में सोमू नाम का एक लोमड़ी और मणि नाम का एक गधा रहते थे। वे अक्सर साथ घूमते थे, लेकिन सोमू बहुत ही स्वार्थी और चालाक था। एक दिन जब वे जंगल के बीच में भोजन की तलाश कर रहे थे, तभी एक खूंखार शेर उनके सामने आ गया।
शेर की दहाड़ सुनकर सोमू बुरी तरह डर गया। अपनी जान बचाने के लिए उसने एक चाल चली। "महाराज!" सोमू गिड़गिड़ाया, "अगर आप मुझे अभी खा लेंगे, तो आपका पेट आज ही भरेगा। लेकिन अगर आप मुझे जाने दें, तो मैं आपके लिए एक बहुत बड़ा दावत लेकर आऊंगा!"
शेर ने हैरानी से पूछा, "तुम ऐसा कैसे कर सकते हो?"
सोमू ने झूठ बोला, "मेरा दोस्त मणि बहुत तंदुरुस्त है। अगर मैं उसे बुलाऊं, तो वह दौड़ता हुआ आएगा!"
शेर को बड़ा भोजन मिलने की लालच आ गई। सोमू तुरंत मणि के पास गया और बोला, "मणि, शेर आ रहा है! चलो हम मिलकर उसकी मदद करते हैं!" मणि ने अपने दोस्त पर भरोसा किया और उसके साथ चल दिया।
जैसे ही वे शेर के पास पहुँचे, सोमू एक झाड़ी के पीछे छिप गया। शेर ने मणि पर हमला करना शुरू किया। यह देखकर सोमू बाहर आया और मजाक उड़ाते हुए बोला, "देखा महाराज! मैंने कहा था न कि मैं दावत लेकर आऊंगा!"
शेर गुस्से से दहाड़ा, "मूर्ख लोमड़ी! अपनी जान बचाने के लिए तूने अपने ही दोस्त को खतरे में डाल दिया? जो दोस्त को धोखा दे सकता है, उस पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता। तुझे तेरी इस चालाकी की सजा मिलेगी!"
शेर ने सोमू को सबक सिखाया। सोमू की चालाकी ने न केवल उसके दोस्त को मुसीबत में डाला, बल्कि उसे खुद भी बड़ी मुश्किल में फंसा दिया।
Moral
स्वार्थ और धोखेबाजी अंत में खुद का ही नुकसान करती है।