बहुत समय पहले, जब दुनिया हरी-भरी और ठंडी थी, तब साँपों के पूर्वज 'छाया छिपकलियाँ' हुआ करते थे। उनके पास चलने के लिए चार मजबूत पैर थे।
लेकिन धीरे-धीरे दुनिया बदलने लगी। घने जंगल सूखने लगे और विशाल रेगिस्तान बन गए। जानवरों को पानी की तलाश में दूर बहती नदियों तक जाना पड़ा। पक्षी उड़ गए और ऊँटों ने तपती रेत में चलने की तैयारी की।
लेकिन उन छिपकलियों के लिए एक बड़ी समस्या थी। जब वे रेत पर चलने की कोशिश करतीं, तो उनके पैर गर्म रेत से जलने लगते। 'ये पैर हमारे लिए मुसीबत बन रहे हैं!' एक छोटी छिपकली ने दर्द में कहा।
उन्होंने एक नया तरीका अपनाया। रेत के ऊपर चलने के बजाय, उन्होंने अपने शरीर को मोड़कर रेत के अंदर रेंगना शुरू कर दिया। उन्होंने पाया कि रेत के नीचे का हिस्सा ठंडा होता है और वहाँ बिना पैरों के फिसलना बहुत आसान है। पीढ़ियों तक ऐसा करने के कारण, उनके पैर धीरे-धीरे छोटे होते गए और अंत में पूरी तरह गायब हो गए।
पैर न होना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक वरदान बन गया। अब वे रेत के नीचे तेजी से जा सकती थीं, छोटी जगहों में छिप सकती थीं और गर्मी से बच सकती थीं। उन्होंने समझ लिया कि बदलाव ही जीवन का असली नियम है।
Moral
परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना ही जीवन की सफलता है।