एक सुंदर गाँव में कवि और ऋषि नाम के दो भाई रहते थे। कवि बहुत ही शांत और संतोषी स्वभाव का था, वह छोटी-छोटी चीज़ों में खुशियाँ ढूँढ लेता था। इसके विपरीत, ऋषि को कभी भी किसी चीज़ से संतोष नहीं होता था। उसे हमेशा लगता था कि उसके पास और भी ज़्यादा होना चाहिए।
उनके पिता एक मेहनती किसान थे। एक दिन उन्होंने दोनों भाइयों को बुलाया और कहा, "अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम दोनों इस ज़मीन को आपस में बाँट लो।"
कवि ने विनम्रता से कहा, "पिताजी, आप जो भी देंगे, मुझे उसमें खुशी मिलेगी।"
लेकिन ऋषि ने ज़िद की, "मुझे सबसे बड़ा हिस्सा चाहिए, पिताजी!"
पिता ने उन्हें एक सबक सिखाने का सोचा। उन्होंने कहा, "ठीक है, हम एक प्रतियोगिता करेंगे। कल सुबह तुम दोनों इस खेत से चलना शुरू करोगे। सूरज डूबने तक तुम जितना पैदल चल सकोगे, उतनी ज़मीन तुम्हारी होगी। लेकिन शर्त यह है कि तुम्हें नंगे पैर चलना होगा।"
अगले दिन यात्रा शुरू हुई। कवि धीरे-धीरे चल रहा था। दोपहर तक पहुँचते-पहुँचते कवि ने सोचा, "जितनी ज़मीन मुझे मिल रही है, वह मेरे परिवार के लिए काफी है। अब मुझे और आगे जाने की ज़रूरत नहीं है।" वह खुशी-खुशी वापस घर आ गया।
लेकिन ऋषि के मन में लालच था। वह सोचता रहा, "अगर मैं थोड़ा और आगे जाऊँगा, तो मुझे बहुत सारी ज़मीन मिलेगी!" गर्मी और पत्थरों की चुभन के बावजूद वह चलता रहा। सूरज ढलने लगा, लेकिन ऋषि अभी भी बहुत दूर निकल गया था।
जब सूरज पूरी तरह डूब गया, कवि अपने पिता के पास बैठा था। ऋषि बहुत देर बाद, थका-हारा और लंगड़ाता हुआ वापस आया। वह समय पर वापस नहीं पहुँच पाया क्योंकि वह बहुत दूर निकल गया था।
पिता ने कवि की ओर देखा और कहा, "कवि, क्योंकि तुम संतोषी हो, इसलिए तुम्हें इस खेत का सबसे अच्छा हिस्सा मिलेगा।" फिर उन्होंने ऋषि से कहा, "ऋषि, तुम्हारे लालच ने तुम्हें बहुत दूर भेज दिया, इसलिए तुम्हें केवल उतना ही हिस्सा मिलेगा जितना तुम वापस लौटते समय पा सके।"
ऋषि को अपनी गलती का अहसास हुआ कि लालच ने उसका नुकसान कर दिया।
Moral
संतोष ही सबसे बड़ा धन है।