एक घने जंगल के बीचों-बीच एक सुंदर नीला तालाब था, जहाँ रंग-बिरंगी मछलियाँ खुशी-खुशी रहती थीं। तालाब के किनारे एक बूढ़ा बगुला रहता था। उम्र बढ़ने के कारण अब वह मछलियाँ पकड़ने में असमर्थ था। भूख से परेशान होकर बगुले ने एक चाल चली।
एक दिन बगुला मछलियों के पास गया और बनावटी दुख जताते हुए बोला, "मेरे प्यारे दोस्तों, यह तालाब जल्द ही सूखने वाला है! अगर तुम यहीं रहे, तो मर जाओगे। पास ही एक बहुत बड़ा और गहरा तालाब है, जहाँ तुम सुरक्षित रह सकते हो। क्या मैं तुम्हें वहाँ ले चलूँ?"
मछलियाँ डर गईं और पूछने लगीं, "पर तुम हमें वहाँ कैसे ले जाओगे?" बगुले ने झूठ बोला, "मैं रोज़ दो मछलियों को अपनी पीठ पर बैठाकर वहाँ ले जाऊँगा।"
मछलियाँ उसकी बात मान गईं। हर दिन दो मछलियाँ उसकी पीठ पर सवार होतीं, लेकिन बगुला उन्हें नए तालाब में ले जाने के बजाय एक चट्टान पर ले जाता और उन्हें खा जाता।
एक समझदार केकड़ा यह सब देख रहा था। उसने बगुले की सच्चाई जान ली। केकड़े ने बगुले से कहा, "बगुला भाई, मुझे भी उस नए तालाब को देखना है। क्या तुम मुझे भी साथ ले चलोगे?"
बगुला मन ही मन खुश हुआ कि आज केकड़े का स्वाद चखने को मिलेगा। उसने कहा, "हाँ, क्यों नहीं! चलो बैठो।"
जैसे ही बगुला उसे उस चट्टान के पास ले गया, केकड़े ने देखा कि वहाँ मछलियों की हड्डियाँ बिखरी पड़ी हैं। केकड़ा तुरंत समझ गया कि बगुला झूठ बोल रहा है। इससे पहले कि बगुला कुछ बोल पाता, केकड़े ने अपने मज़बूत पंजों से बगुले की गर्दन को ज़ोर से पकड़ लिया और काट लिया। दर्द से चिल्लाते हुए बगुला नीचे गिर गया। केकड़े ने बगुले के लालच और धोखे का अंत कर दिया।
Moral
धूर्त लोगों की बातों पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए।