एक शांत गाँव में नीला नाम की एक छोटी लड़की रहती थी। नीला को बागवानी करने का बहुत शौक था। उसे मिट्टी खोदना, बीज बोना और पौधों को बढ़ते हुए देखना बहुत पसंद था।
एक दिन नीला ने देखा कि उसके बगीचे में कोई रंगीन फूल नहीं हैं। उसने सोचा कि उसके बगीचे में सुनहरे पीले फूल होने चाहिए। वह बाज़ार गई और पीले फूलों के खास बीज खरीद लाई। उसने बड़ी मेहनत से ज़मीन खोदी, बीज बोए और रोज़ उन्हें प्यार से पानी दिया।
हफ़्तों बीत गए। पौधा बड़ा हो गया और एक घनी झाड़ी जैसा दिखने लगा। लेकिन, इतनी हरियाली होने के बावजूद, उस पर एक भी कली नहीं आई। नीला रोज़ उम्मीद से देखती, पर उसे निराशा ही हाथ लगती। एक दिन, नीला बहुत परेशान हो गई। उसने सोचा, "यह पौधा तो बस पत्तियाँ ही उगा रहा है, फूल तो कभी खिलेंगे ही नहीं! इसे उखाड़ देना ही बेहतर है," और वह एक खुरपी लेकर बगीचे में आ गई।
तभी पड़ोस के दादाजी ने उसे आवाज़ दी, "नीला, तुम इतनी उदास क्यों हो?"
"दादाजी, मैंने इस पौधे की इतनी देखभाल की, पर इसमें एक भी फूल नहीं खिला। मुझे लगता है यह बेकार का पौधा है, इसलिए मैं इसे हटा रही हूँ," नीला ने दुखी होकर कहा।
दादाजी मुस्कुराए और बोले, "नीला, कभी-कभी हम पूरी सच्चाई नहीं देख पाते। आओ, मेरे बगीचे के पीछे वाले हिस्से में चलो।"
नीला उनके साथ चली। वहाँ एक छोटी सी दीवार थी, जिसके छेद से उस पौधे की एक टहनी दादाजी के बगीचे में निकल रही थी। वहाँ सूरज की रोशनी बहुत अच्छी आ रही थी, और उस टहनी पर ढेर सारे सुंदर पीले फूल खिले हुए थे! नीला को समझ आया कि पौधे का वह हिस्सा जहाँ फूल नहीं खिल रहे थे, वहाँ धूप कम पहुँच रही थी।
नीला को अपनी गलती का अहसास हुआ। "ओह! मैं कितनी मूर्ख थी, मैंने बिना सोचे-समझे इसे उखाड़ने का फैसला कर लिया था," उसने कहा। उसने धैर्य रखा और पौधे की देखभाल जारी रखी। कुछ ही दिनों में, पूरा पौधा पीले फूलों से जगमगा उठा।
नीला ने सीखा कि हर चीज़ को बढ़ने में समय लगता है और धैर्य रखने से ही मीठा फल मिलता है।
Moral
धैर्य का फल हमेशा मीठा होता है; जल्दबाजी में निर्णय न लें।